Saturday, July 29, 2023

Hindi Quiz | आपहुदरी | भोलाराम का जीव | जामुन का पेड़


👉निम्नलिखित प्रश्न यू॰जी॰सी॰ नेट के पाठ्यक्रम में शामिल तीन रचनाओं (आपहुदरी, भोलाराम का जीव और जामुन का पेड़) पर आधारित हैं। जो विभिन्न परीक्षाओं में पूंछे जा चुके हैं।

 

1➤ आपहुदरी किस प्रकार की रचना है ?






2➤ आपहुदरी के संबंध में सत्य नहीं है ?






3➤ आपहुदरी का प्रकाशन कब हुआ था ?






4➤ ‘आपहुदरी’ किस भाषा का शब्द है ?






5➤ ‘आपहुदरी’ में लेखिका पर किसका प्रभाव है ?






6➤ रमणिका गुप्ता का वास्तविक नाम क्या है ?






7➤ आपहुदरी आत्मकथा के आधार पर रमणिका गुप्ता का प्रारंभिक प्रेम निम्नलिखित में से किस पात्र से हुआ था ?






8➤ रमणिका गुप्ता का जन्म किस राज्य में हुआ था ?






9➤ आपहुदरी की लेखिका किस पुस्तक को पढ़ने के बाद पूजा-पाठ कर्मकाण्डों पर विश्वास कम करने लगीं ?






10➤ आपहुदरी में लेखिका ने किस पंजाबी कुप्रथा का वर्णन किया है ?






11➤ ‘आपहुदरी एक दिलचस्प और दिलकश आत्मकथा है।’ किसका कथन है ?






12➤ भोलाराम का जीव किस विधा की रचना है ?






13➤ ‘भोलाराम का जीव’ की शुरूआत कहां से होती है ?






14➤ ‘भोलाराम का जीव’ की कथावस्तु है ?






15➤ ‘भोलाराम का जीव’ के संदर्भ में सही नहीं है ?






16➤ ‘जामुन का पेड़’ के लेखक हैं ?






17➤ ‘जामुन का पेड़’ किस विधा की रचना है ?






18➤ ‘जामुन का पेड़’ की विषय वस्तु आधारित है ?






19➤ ‘जामुन का पेड़’ का नायक किन दो विभागों की कार्यशैली से जूझ रहा है ?






20➤ जामुन के पेड़ से दबे शायर के शायरी- संग्रह का नाम था ?






Sunday, July 16, 2023

कहानी | हरिचरण | शरतचंद्र चट्टोपाध्याय | Kahani | Haricharan | Sarat Chandra Chattopadhyay



कहानी - हरिचरण

बहुत पहले की बात है। लगभग दस-बारह वर्ष हो गए होंगे। दुर्गादास बाबू तब तक वकील नहीं बने थे। दुर्गादास बंद्योपाध्याय को शायद तुम ठीक से पहचानते नहीं हो, मैं जानता हूं उन्हें। आइए, उनसे परिचय करा देता हूं।

बचपन में कहीं से एक अनाथ कायस्थ बालक ने रामदास बाबू के घर में आश्रय लिया था। सब कहते, लड़का बड़ा होनहार है, सुंदर बुद्धिमान नौकर। दुर्गादास बाबू के पिता का स्नेही भृत्य।

वह सारा काम निपटा दिया करता। गाय को चारा देने से लेकर बाबू की तेल-मालिश तक, सब वह स्वयं ही करना चाहता। हमेशा व्यस्त रहने में ही उसे खुशी मिलती।

लड़के का नाम हरिचरण था। घर की मालकिन अकसर उसे देखकर चकित होती। कभी-कभार टोक भी देती, ‘हरि, दूसरे नौकर भी हैं। तुम बच्चे हो, इतना काम क्यों करते हो?’

हरि में एक और कमी कह सकते हैं। वह हंसना बहुत पसंद करता था। हंसकर उत्तर देता, ‘मां, हम गरीब हैं। हमेशा काम करना पड़ेगा और वैसे भी बैठकर क्या होगा?’

इस तरह काम करते हुए स्नेह की गोद में पलता हरिचरण का एक वर्ष व्यतीत हुआ।

सुरो रामदास की छोटी बेटी है। उम्र अभी लगभग पांच-छह वर्ष। हरिचरण के साथ उसकी बड़ी आत्मीयता है। जब उसे दूध पिलाना होता तो उसकी मां को हमेशा बड़ी परेशानी होती। अथक प्रयत्न के बाद भी जब वह अपनी बेटी को दूध पीने के लिए नहीं मना पाती तो हरिचरण की बातों का ही उस पर असर होता। अब छोड़ो, यह सब। बेकार की बातें बहुत हुईं। असल मुद्दे पर आता हूं। सुनो! शायद सूरो के हृदय में हरिचरण के प्रति प्रेम का अंकुर फूटने लगा था।

दुर्गादास बाबू की उम्र जब बीस वर्ष की थी, तब की घटना सुनाता हूं। वह उन दिनों कलकत्ते में पढ़ा करता था। घर आने के लिए स्टीमर पर दक्षिण की ओर जाना पड़ता था। उसके बाद भी लगभग दस-बारह कोस पैदल चलना होता। राह इतनी सुगम्य नहीं थी। इस कारण दुर्गादास बाबू घर बहुत कम आते।

इन दिनों वह बी.ए. पास होकर घर लौटे हैं। मां अत्यंत व्यस्त थी। उन्हें अच्छी तरह खिलाना-पिलाना, देखभाल करना जैसे पूरे घर में उमड़ पड़ा था। दुर्गादास ने पूछा, ‘मां, यह लड़का कौन है?’

‘यह एक कायस्थ का बेटा है। मां-बाप नहीं है इसलिए तुम्हारे पिता ने उसे रखा है। नौकर का सारा काम कर लेता है और निहायत ही शांत-प्रकृति का है। किसी बात पर भी क्रोधित नहीं होता। आह! मां-बाप हैं नहीं, उस पर छोटा-सा बालक। मैं उससे बहुत स्नेह करती हूं।’ दुर्गादास बाबू को हरिचरण का यही परिचय मिला।

जो भी हो, आजकल हरिचरण का काम बहुत बढ़ गया है, पर इससे वह तनिक भी असंतुष्ट नहीं है। छोटे बाबू (दुर्गादास) को स्नान कराना, आवश्यकतानुसार घड़े में जल भरकर लाना, ठीक समय पर पान उपलब्ध कराना, उपयुक्त अवसरानुसार हुक्के का प्रबंध इत्यादि में वह अत्यंत पटु था। दुर्गादास बाबू भी अकसर सोचते, लड़का निहायत ही ‘इंटेलिजेंट’ है। अतः कपड़े धोना, तंबाकू सजाना जैसे काम हरिचरण के न करने पर और किसी का काम उन्हें पसंद नहीं आता।

कुछ समझ नहीं पाता हूं। कहां का पानी कहां जाकर खड़ा होता है। ये सब बातें सबके लिए समझ पाना संभव नहीं, आवश्यकता भी नहीं और मेरा भी फिलासफी लेकर डील करने का उद्देश्य नहीं है। फिर भी आपसे दो बातें कहने में हानि क्या है?

आज दुर्गादास बाबू को एक भव्य रात्रिभोज का निमंत्रण है। घर में नहीं खाएंगे, संभवतः देर रात से लौटेंगे। सो, हरिचरण से कह गए कि सब काम निपटाने के बाद उसका बिस्तर व्यवस्थित कर रखे।

अब हरिचरण की सुनें। दुर्गादास बाबू बाहर के बैठक में रात को सोते हैं। इसका कारण कोई नहीं जानता। मुझे लगता है कि पत्नी के मायके में रहने के कारण ही उन्हें बाहर के कमरे में सोना अच्छा लगता है। रात को सोते समय हरिचरण उनके पांव दबाता है और जब वे गहरी नींद में चले जाते हैं तो वह साथ के कमरे में सोने चला जाता है।

उस दिन शाम को हरिचरण के सिर में दर्द शुरू हुआ। उसने जान लिया कि अब बुखार आने में देर नहीं। पहले भी बीच-बीच में उसे बुखार होता रहता है। अतः वह इसके लक्षणों से परिचित है। वह अधिक देर तक न बैठ सका और अपने कमरे में जाकर सो गया। छोटे बाबू का बिस्तर नहीं लग पाया है, इसका भान भी न रहा। रात को सबने भोजन किया पर हरिचरण भोजन के लिए नहीं आया। मालकिन देखने आई। वह सो रहा था। उसके शरीर पर हाथ रखा तो वह बहुत गर्म था। वह समझ गई कि उसे बुखार हुआ है। अतः उसे विरक्त किए बिना वहां से चली आई।

रात का दूसरा पहर था। भोज खाकर जब दुर्गादास बाबू घर लौटे तो देखा कि उसका बिस्तर तैयार नहीं है। एक तो नींद सता रही थी, उस पर सारी राह यह सोचते आए थे कि घर पहुंचते ही चित्त हो जाऊंगा और हरिचरण उसके पांव दबाकर सारी थकान मिटा देगा। इसी सुखानुभूति की अल्पतंद्रा में सुबह हो जाएगी। हताश होकर वे चिल्ला उठे, ‘हरिचरण, ओ हरि, हरे’ इत्यादि कहते हुए शोर मचाने लगे। पर कहां था हरि? वह ज्वरपीडि़त संज्ञाहीन पड़ा हुआ था। तब दुर्गादास बाबू को ख्याल आया, कम्बख्त सो गया होगा। कमरे में जाकर देखा तो सचमुच।

अधिक सहन नहीं कर पाए। जोर से उसे बालों से पकड़कर खींचते हुए बिठाने की कोशिश की पर वह फिर से निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ा। तब क्रोधाग्नि में झुलसे दुर्गादास को हित-अहित का ज्ञान न रहा और हरि की पीठ पर जूता पहने ही आघात किया। उस भीषण चोट से हरिचरण की चेतना लौटी और वह उठकर बैठ गया। दुर्गादास बाबू ने कहा, ‘तो ज़नाब, मजे से सो रहे हैं। बिस्तर क्या मैं स्वयं लगांऊगा?’ कहते हुए उनका क्रोध और भड़का, ‘हाथ में थामे बेंत से उसकी पीठ पर दो-तीन जड़ दिए।

उस रात जब हरि उसके पांव दबा रहा था, तब शायद एक बूंद आंसू दुर्गादास बाबू के पांव पर गिरा था। फिर तो सारी रात दुर्गादास बाबू सो नहीं पाए। वह एक बूंद आंसू बहुत गर्म महसूस हुआ था। दुर्गादास बाबू हरिचरण को बहुत प्यार करते थे। उसकी नम्रता के लिए वे ही क्यों, वह सबका प्रिय पात्र था। विशेषकर इस महीने भर की घनिष्टता में वह उनका और भी अधिक प्रिय हो उठा था।

रात में कई बार दुर्गादास बाबू को लगा कि एक बार देख आएं, कितनी चोट लगी है, कितनी सूजन हुई है? पर वह एक नौकर है, अच्छा नहीं लगेगा। कई बार मन में आया कि एक बार पूछकर आएं, ‘बुखार कम हुआ क्या?’ पर उससे लज्जा महसूस होती। सुबह हरिचरण मुंह धोकर पानी ले आया, तंबाकू सजाया। दुर्गादास बाबू काश तब भी अगर कह पाते, आहा! वह तो बालक है, अब भी तेरह वर्ष का नहीं हुआ। बालक समझकर भी अपने पास खींचकर देखते, बेंत के आघात से कितना रक्त जमा है, जूते से कितना सूजा है? बालक ही तो है, लज्जा की क्या बात है?

नौ बजे के लगभग कहीं से एक तार आया। उससे दुर्गादास बाबू का मन विचलित हो उठा। खोलकर देखा, पत्नी बीमार है। उनका हृदय बैठ गया। उसी दिन कलकत्ता लौटना पड़ा। गाड़ी में बैठते हुए सोचा—भगवान। समझूंगा प्रायश्चित हुआ।

प्रायः महीना हो गया। दुर्गादास बाबू का चेहरा आज प्रफुल्ल है। उनकी पत्नी बच गई।

घर से आज एक पत्र आया। उनके छोटे भाई का था। नीचे पुनश्चः करके लिखा हुआ था—‘बड़े दुःख की बात है। कल सुबह दस दिन ज्वर से भुगतते हुए हमारे हरिचरण की मृत्यु हो गई। मरने से पहले उसने कई बार आपको देखना चाहा था।

आह! बिना मां-बाप का अनाथ।

धीरे-धीरे दुर्गादास बाबू ने उस पत्र को चिंदी-चिंदी कर फेंक दिया।

Monday, July 3, 2023

कहानी | यह मेरी मातृभूमि है | मुंशी प्रेमचंद | Kahani | Yeh Meri Matrabhoomi Hai | Munshi Premchand


कहानी - यह मेरी मातृभूमि है
 
आज पूरे 60 वर्ष के बाद मुझे मातृभूमि-प्यारी मातृभूमि के दर्शन प्राप्त हुए हैं। जिस समय मैं अपने प्यारे देश से विदा हुआ था और भाग्य मुझे पश्चिम की ओर ले चला था उस समय मैं पूर्ण युवा था। मेरी नसों में नवीन रक्त संचारित हो रहा था। हृदय उमंगों और बड़ी-बड़ी आशाओं से भरा हुआ था। मुझे अपने प्यारे भारतवर्ष से किसी अत्याचारी के अत्याचार या न्याय के बलवान हाथों ने नहीं जुदा किया था। अत्याचारी के अत्याचार और कानून की कठोरताएँ मुझसे जो चाहे सो करा सकती हैं मगर मेरी प्यारी मातृभूमि मुझसे नहीं छुड़ा सकतीं। वे मेरी उच्च अभिलाषाएँ और बड़े-बड़े ऊँचे विचार ही थे जिन्होंने मुझे देश-निकाला दिया था।
मैंने अमेरिका जा कर वहाँ खूब व्यापार किया और व्यापार से धन भी खूब पैदा किया तथा धन से आनंद भी खूब मनमाने लूटे। सौभाग्य से पत्नी भी ऐसी मिली जो सौंदर्य में अपना सानी आप ही थी। उसकी लावण्यता और सुन्दरता की ख्याति तमाम अमेरिका में फैली। उसके हृदय में ऐसे विचार की गुंजाइश भी न थी जिसका सम्बन्ध मुझसे न हो मैं उस पर तन-मन से आसक्त था और वह मेरी सर्वस्व थी। मेरे पाँच पुत्र थे जो सुन्दर हृष्ट-पुष्ट और ईमानदार थे। उन्होंने व्यापार को और भी चमका दिया था। मेरे भोले-भाले नन्हे-नन्हे पौत्र गोद में बैठे हुए थे जब कि मैंने प्यारी मातृभूमि के अंतिम दर्शन करने को अपने पैर उठाये। मैंने अनंत धन प्रियतमा पत्नी सपूत बेटे और प्यारे-प्यारे जिगर के टुकड़े नन्हे-नन्हे बच्चे आदि अमूल्य पदार्थ केवल इसीलिए परित्याग कर दिया कि मैं प्यारी भारत-जननी का अंतिम दर्शन कर लूँ। मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ दस वर्ष के बाद पूरे सौ वर्ष का हो जाऊँगा। अब मेरे हृदय में केवल एक ही अभिलाषा बाकी है कि मैं अपनी मातृभूमि का रजकण बनूँ।
यह अभिलाषा कुछ आज ही मेरे मन में उत्पन्न नहीं हुई बल्कि उस समय भी थी जब मेरी प्यारी पत्नी अपनी मधुर बातों और कोमल कटाक्षों से मेरे हृदय को प्रफुल्लित किया करती थी। और जब कि मेरे युवा पुत्र प्रातःकाल आ कर अपने वृद्ध पिता को सभक्ति प्रणाम करते उस समय भी मेरे हृदय में एक काँटा-सा खटखता रहता था कि मैं अपनी मातृभूमि से अलग हूँ। यह देश मेरा देश नहीं है और मैं इस देश का नहीं हूँ।
मेरे पास धन था पत्नी थी लड़के थे और जायदाद थी मगर न मालूम क्यों मुझे रह-रह कर मातृभूमि के टूटे झोंपड़े चार-छै बीघा मौरूसी जमीन और बालपन के लँगोटिया यारों की याद अक्सर सता जाया करती। प्रायः अपार प्रसन्नता और आनंदोत्सवों के अवसर पर भी यह विचार हृदय में चुटकी लिया करता था कि यदि मैं अपने देश में होता।

जिस समय मैं बम्बई में जहाज से उतरा मैंने पहिले काले कोट-पतलून पहने टूटी-फूटी अँग्रेजी बोलते हुए मल्लाह देखे। फिर अँग्रेजी दूकान ट्राम और मोटरगाड़ियाँ दीख पड़ीं। इसके बाद रबरटायरवाली गाड़ियों की ओर मुँह में चुरट दाबे हुए आदमियों से मुठभेड़ हुई। फिर रेल का विक्टोरिया टर्मिनस स्टेशन देखा। बाद में मैं रेल में सवार होकर हरी-भरी पहाड़ियों के मध्य में स्थित अपने गाँव को चल दिया। उस समय मेरी आँखों में आँसू भर आये और मैं खूब रोया क्योंकि यह मेरा देश न था। यह वह देश न था जिसके दर्शनों की इच्छा सदा मेरे हृदय में लहराया करती थी। यह तो कोई और देश था। यह अमेरिका या इंगलैंड था मगर प्यारा भारत नहीं था।
रेलगाड़ी जंगलों पहाड़ों नदियों और मैदानों को पार करती हुई मेरे प्यारे गाँव के निकट पहुँची जो किसी समय में फूल पत्तों और फलों की बहुतायत तथा नदी-नालों की अधिकता से स्वर्ग की होड़ कर रहा था। मैं उस गाड़ी से उतरा तो मेरा हृदय बाँसों उछल रहा था-अब अपना प्यारा घर देखूँगा-अपने बालपन के प्यारे साथियों से मिलूँगा। मैं इस समय बिलकुल भूल गया था कि मैं 90 वर्ष का बूढ़ा हूँ। ज्यों-ज्यों मैं गाँव के निकट आता था मेरे पग शीघ्र-शीघ्र उठते थे और हृदय में अकथनीय आनंद का श्रोत उमड़ रहा था। प्रत्येक वस्तु पर आँखें फाड़-फाड़ कर दृष्टि डालता। अहा ! यह वही नाला है जिसमें हम रोज घोड़े नहलाते थे और स्वयं भी डुबकियाँ लगाते थे किंतु अब उसके दोनों ओर काँटेदार तार लगे हुए थे। सामने एक बँगला था जिसमें दो अँग्रेज बंदूकें लिये इधर-उधर ताक रहे थे। नाले में नहाने की सख्त मनाही थी।
गाँव में गया और निगाहें बालपन के साथियों को खोजने लगीं किन्तु शोक ! वे सब के सब मृत्यु के ग्रास हो चुके थे। मेरा घर-मेरा टूटा-फूटा झोंपड़ा-जिसकी गोद में मैं बरसों खेला था जहाँ बचपन और बेफिक्री के आनंद लूटे थे और जिसका चित्र अभी तक मेरी आँखों में फिर रहा था वही मेरा प्यारा घर अब मिट्टी का ढेर हो गया था।
यह स्थान गैर-आबाद न था। सैकड़ों आदमी चलते-चलते दृष्टि आते थे जो अदालत-कचहरी और थाना-पुलिस की बातें कर रहे थे उनके मुखों से चिंता निर्जीवता और उदासी प्रदर्शित होती थी और वे अब सांसारिक चिंताओं से व्यथित मालूम होते थे। मेरे साथियों के समान हृष्ट-पुष्ट बलवान लाल चेहरे वाले नवयुवक कहीं न देख पड़ते थे। उस अखाड़े के स्थान पर जिसकी जड़ मेरे हाथों ने डाली थी अब एक टूटा-फूटा स्कूल था। उसमें दुर्बल तथा कांतिहीन रोगियों की-सी सूरतवाले बालक फटे कपड़े पहिने बैठे ऊँघ रहे थे। उनको देख कर सहसा मेरे मुख से निकल पड़ा कि नहीं-नहीं यह मेरा प्यारा देश नहीं है। यह देश देखने मैं इतनी दूर से नहीं आया हूँ-यह मेरा प्यारा भारतवर्ष नहीं है।
बरगद के पेड़ की ओर मैं दौड़ा जिसकी सुहावनी छाया में मैंने बचपन के आनंद उड़ाये थे जो हमारे छुटपन का क्रीड़ास्थल और युवावस्था का सुखप्रद वासस्थान था। आह ! इस प्यारे बरगद को देखते ही हृदय पर एक बड़ा आघात पहुँचा और दिल में महान् शोक उत्पन्न हुआ। उसे देख कर ऐसी-ऐसी दुःखदायक तथा हृदय-विदारक स्मृतियाँ ताजी हो गयीं कि घंटों पृथ्वी पर बैठे-बैठे मैं आँसू बहाता रहा। हाँ ! यही बरगद है जिसकी डालों पर चढ़ कर मैं फुनगियों तक पहुँचता था जिसकी जटाएँ हमारा झूला थीं और जिसके फल हमें सारे संसार की मिठाइयों से अधिक स्वादिष्ट मालूम होते थे। मेरे गले में बाँहें डाल कर खेलनेवाले लँगोटिया यार जो कभी रूठते थे कभी मनाते थे कहाँ गये हाय बिना घरबार का मुसाफिर अब क्या अकेला ही हूँ क्या मेरा कोई भी साथी नहीं इस बरगद के निकट अब थाना था और बरगद के नीचे कोई लाल साफा बाँधे बैठा था। उसके आस-पास दस-बीस लाल पगड़ीवाले करबद्ध खड़े थे ! वहाँ फटे-पुराने कपड़े पहने दुर्भिक्षग्रस्त पुरुष जिस पर अभी चाबुकों की बौछार हुई थी पड़ा सिसक रहा था। मुझे ध्यान आया कि यह मेरा प्यारा देश नहीं है कोई और देश है। यह योरोप है अमेरिका है मगर मेरी प्यारी मातृभूमि नहीं है-कदापि नहीं है।

इधर से निराश हो कर मैं उस चौपाल की ओर चला जहाँ शाम के वक्त पिता जी गाँव के अन्य बुजुर्गों के साथ हुक्का पीते और हँसी-कहकहे उड़ाते थे। हम भी उस टाट के बिछौने पर कलाबाजियाँ खाया करते थे। कभी-कभी वहाँ पंचायत भी बैठती थी जिसके सरपंच सदा पिता जी ही हुआ करते थे। इसी चौपाल के पास एक गोशाला थी जहाँ गाँव भर की गायें रखी जाती थीं और बछड़ों के साथ हम यहीं किलोलें किया करते थे। शोक ! कि अब उस चौपाल का पता तक न था। वहाँ अब गाँवों में टीका लगाने की चौकी और डाकखाना था।
उस समय इसी चौपाल से लगा एक कोल्हवाड़ा था जहाँ जाड़े के दिनों में ईख पेरी जाती थी और गुड़ की सुगंध से मस्तिष्क पूर्ण हो जाता था। हम और हमारे साथी वहाँ गंडरियों के लिए बैठे रहते और गंडरियाँ करनेवाले मजदूरों के हस्तलाघव को देख कर आश्चर्य किया करते थे। वहाँ हजारों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिला कर पिया था और वहाँ आस-पास के घरों की स्त्रियाँ और बालक अपने-अपने घड़े ले कर आते थे और उनमें रस भर कर ले जाते थे। शोक है कि वे कोल्हू अब तक ज्यों के त्यों खड़े थे किन्तु कोल्हवाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटनेवाली मशीन लगी थी और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेटवाले की दूकान थी। इन हृदय-विदारक दृश्यों को देखकर मैंने दुखित हृदय से एक आदमी से जो देखने में सभ्य मालूम होता था पूछा महाशय मैं एक परदेशी यात्री हूँ। रात भर लेट रहने की मुझे आज्ञा दीजिएगा इस आदमी ने मुझे सिर से पैर तक गहरी दृष्टि से देखा और कहने लगा कि आगे जाओ यहाँ जगह नहीं है। मैं आगे गया और वहाँ से भी यही उत्तर मिला आगे जाओ। पाँचवीं बार एक सज्जन से स्थान माँगने पर उन्होंने एक मुट्ठी चने मेरे हाथ पर रख दिये। चने मेरे हाथ से छूट पड़े और नेत्रों से अविरल अश्रु-धारा बहने लगी। मुख से सहसा निकल पड़ा कि हाय ! यह मेरा देश नहीं है यह कोई और देश है। यह हमारा अतिथि-सत्कारी प्यारा भारत नहीं है-कदापि नहीं।
मैंने एक सिगरेट की डिबिया खरीदी और एक सुनसान जगह पर बैठकर सिगरेट पीते हुए पूर्व समय की याद करने लगा कि अचानक मुझे धर्मशाला का स्मरण हो आया जो मेरे विदेश जाते समय बन रही थी मैं उस ओर लपका कि रात किसी प्रकार वहीं काट लूँ मगर शोक ! शोक ! ! महान् शोक ! ! ! धर्मशाला ज्यों की त्यों खड़ी थी किंतु उसमें गरीब यात्रियों के टिकने के लिए स्थान न था। मदिरा दुराचार और द्यूत ने उसे अपना घर बना रखा था। यह दशा देख कर विवशतः मेरे हृदय से एक सर्द आह निकल पड़ी और मैं जोर से चिल्ला उठा कि नहीं नहीं नहीं और हजार बार नहीं है -यह मेरा प्यारा भारत नहीं है। यह कोई और देश है। यह योरोप है अमेरिका है मगर भारत कदापि नहीं है।

अँधेरी रात थी। गीदड़ और कुत्ते अपने-अपने कर्कश स्वर में उच्चारण कर रहे थे। मैं अपना दुखित हृदय ले कर उसी नाले के किनारे जा कर बैठ गया और सोचने लगा-अब क्या करूँ ! फिर अपने पुत्रों के पास लौट जाऊँ और अपना यह शरीर अमेरिका की मिट्टी में मिलाऊँ। अब तक मेरी मातृभूमि थी मैं विदेश में जरूर था किंतु मुझे अपने प्यारे देश की याद बनी थी पर अब मैं देश-विहीन हूँ। मेरा कोई देश नहीं है। इसी सोच-विचार में मैं बहुत देर तक घुटनों पर सिर रखे मौन रहा। रात्रि नेत्रों में ही व्यतीत की। घंटेवाले ने तीन बजाये और किसी के गाने का शब्द कानों में आया। हृदय गद्गद हो गया कि यह तो देश का ही राग है यह तो मातृभूमि का ही स्वर है। मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ और क्या देखता हूँ कि 15-20 वृद्धा स्त्रियाँ सफेद धोतियाँ पहिने हाथों में लोटे लिये स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं:
हमारे प्रभु अवगुन चित्त न धरो...
मैं इस गीत को सुन कर तन्मय हो ही रहा था कि इतने में मुझे बहुत से आदमियों की बोलचाल सुन पड़ी। उनमें से कुछ लोग हाथों में पीतल के कमंडलु लिये हुए शिव-शिव हर-हर गंगे-गंगे नारायण-नारायण आदि शब्द बोलते हुए चले जाते थे। आनंददायक और प्रभावोत्पादक राग से मेरे हृदय पर जो प्रभाव हुआ उसका वर्णन करना कठिन है।
मैंने अमेरिका की चंचल से चंचल और प्रसन्न से प्रसन्न चित्तवाली लावण्यवती स्त्रियों का आलाप सुना था सहर्षों बार उनकी जिह्वा से प्रेम और प्यार के शब्द सुने थे हृदयाकर्षक वचनों का आनंद उठाया था मैंने सुरीले पक्षियों का चहचहाना भी सुना था किंतु जो आनंद जो मजा और जो सुख मुझे इस राग में आया वह मुझे जीवन में कभी प्राप्त नहीं हुआ था। मैंने खुद गुनगुना कर गायाः
हमारे प्रभु अवगुन चित न धरो...
मेरे हृदय में फिर उत्साह आया कि ये तो मेरे प्यारे देश की ही बातें हैं। आनंदातिरेक से मेरा हृदय आनंदमय हो गया। मैं भी इन आदमियों के साथ हो लिया और 6 मील तक पहाड़ी मार्ग पार करके उसी नदी के किनारे पहुँचा जिसका नाम पतित-पावनी है जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना प्रत्येक हिंदू अपना परम सौभाग्य समझता है। पतित-पावनी भागीरथी गंगा मेरे प्यारे गाँव से छै-सात मील पर बहती थी। किसी समय में घोड़े पर चढ़ कर गंगा माता के दर्शनों की लालसा मेरे हृदय में सदा रहती थी। यहाँ मैंने हजारों मनुष्यों को इस ठंडे पानी में डुबकी लगाते हुए देखा। कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री-मंत्र जप रहे थे। कुछ लोग हवन करने में संलग्न थे। कुछ माथे पर तिलक लगा रहे थे और कुछ लोग सस्वर वेदमंत्र पढ़ रहे थे। मेरा हृदय फिर उत्साहित हुआ और मैं जोर से कह उठा- हाँ हाँ यही मेरा प्यारा देश है यही मेरी पवित्र मातृभूमि है यही मेरा सर्वश्रेष्ठ भारत है और इसी के दर्शनों की मेरी उत्कट इच्छा थी तथा इसी की पवित्र धूलि के कण बनने की मेरी प्रबल अभिलाषा है।

मैं विशेष आनंद में मग्न था। मैंने अपना पुराना कोट और पतलून उतार कर फेंक दिया और गंगा माता की गोद में जा गिरा जैसे कोई भोलाभाला बालक दिन भर निर्दय लोगों के साथ रहने के बाद संध्या को अपनी प्यारी माता की गोद में दौड़ कर चला आये और उसकी छाती से चिपट जाय। हाँ अब मैं अपने देश में हूँ। यह मेरी प्यारी मातृभूमि है। ये लोग मेरे भाई हैं और गंगा मेरी माता है।
मैंने ठीक गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटी बनवा ली है। अब मुझे सिवा राम-नाम जपने के और कोई काम नहीं है। मैं नित्य प्रातः-सायं गंगा-स्नान करता हूँ और मेरी प्रबल इच्छा है कि इसी स्थान पर मेरे प्राण निकलें और मेरी अस्थियाँ गंगा माता की लहरों की भेंट हों।
मेरी स्त्री और मेरे पुत्र बार-बार बुलाते हैं मगर अब मैं यह गंगा माता का तट और अपना प्यारा देश छोड़ कर वहाँ नहीं जा सकता। अपनी मिट्टी गंगा जी को ही सौंपूँगा। अब संसार की कोई आकांक्षा मुझे इस स्थान से नहीं हटा सकती क्योंकि यह मेरा प्यारा देश और यही प्यारी मातृभूमि है। बस मेरी उत्कट इच्छा यही है कि मैं अपनी प्यारी मातृभूमि में ही अपने प्राण विसर्जन करूँ।

Monday, May 15, 2023

यात्रावृतांत | अमरीका दिग्दर्शन | सत्यदेव परिव्राजक | Yatravratant | America Digdarshan | Satyadev Parivrajak


यात्रा- वृतांत - अमरीका दिग्दर्शन

शिकागो संसार के प्रसिद्ध नगरों में से एक है जगद्विख्यात धनी जान-डी-राकफेलर स्थापित विश्वविद्यालय यहीं पर है। अमरीका के बड़े-बड़े कारख़ाने, पुतली घर यहीं पर हैं। इन कारख़ानों में हरएक क़ौम के लोग काम करते हैं। इतने बड़े प्रसिद्ध नगर के लोग अपने अवकाश का समय कैसे काटते हैं? वे अपना दिल कैसे बहलाते हैं? उस नगरी में देखने लायक क्या कुछ है? पाठकों के विनोदार्थ इन प्रश्नों का उत्तर हम इस लेख में देते हैं। 

आइए आपको शिकागो की सैर कराएँ, इसके अजीब-अजीब दृश्य दिखावें, और आपको बतलावें कि इस प्रसिद्ध नगरी में कौन कौन स्थान दर्शनीय हैं। साथ ही हम इस नगर के निवासियों के रहन सहन का ब्योरा भी देते जाएँगे, जिसमें आपको अमरीका के इस प्रांत वालों की जीवनचर्या के विषय में भी कुछ ज्ञान हो जाए। इस काम के लिए हमने रविवार का दिन चुना है। उसी की महिमा हम इस लेख में वर्णन करेंगे। इससे हमारा अभीष्ट भी सिद्ध हो जाएगा और आपको यह भी मालूम हो जाएगा कि शिकागो के निवासी रविवार की छुट्टी किस तरह मनाते हैं। 

रविवार छुट्टी का दिन है। भारतवर्ष में छोटे-छोटे बच्चे, जो स्कूलों में पढ़ते हैं, वे भी यह बात जानते हैं। एशिया और अफ़्रीका में जहाँ-जहाँ ईसाई लोगों का राज्य है सब कहीं स्कूलों और दफ़्तरों में रविवार को छुट्टी रहती है। परंतु रविवार की छुट्टी किस तरह माननी चाहिए, यह बात ईसाई धर्मावलंबियों के बीच रहे बिना अच्छी तरह नहीं अनुभव की जा सकती। रविवार की छुट्टी मनाने के लिए शिकागो में कैसे-कैसे स्थान बनाए गए हैं और किस प्रकार यहाँ वाले जीवन का आनंद लूटते हैं, इसका संक्षिप्त हाल सुनिए। 

ईसाई-धर्म में रविवार को काम करना मना है। इस लिए सब दुकानें, पुस्तकालय, कारख़ाने आदि इस दिन बंद रहते हैं। क्या निर्धन क्या धनवान, क्या नौकर क्या स्वामी, क्या बालक क्या वृद्ध, क्या स्त्री क्या पुरुष सबके लिए आज छुट्टी है। 10:30 या 11 बजे, नियत समय पर, प्रातः काल, प्रायः सब लोग अपने अपने गिरजाघरों में जाते हुए दिखाई देते हैं। वहाँ ईश्वराधना के बाद घर लौटकर भोजन करते हैं; फिर कुछ देर आराम करके सैर को निकलते हैं। 

शिकागो बहुत बड़ा शहर है। संसार के बड़े शहरों में इसका तीसरा नंबर है। यहाँ एक 'फील्ड म्यूज़ियम' अर्थात् अजायब घर है। यह मिशिगन झील के किनारे, शिकागो विश्वविद्यालय से थोड़ी ही दूर पर, है। रविवार को सवेरे नौ बजे से शाम के पाँच बजे तक, सबको यहाँ मुफ़्त सैर करने की आज्ञा है। इसलिए इस दिन यहाँ बड़ी भीड़ रहती है। आठ नौ बरस के आलक, बालिकाएँ ऐसे ही स्थानों से अपनी विद्या का प्रारंभ करते हैं। क्योंकि यहाँ पर संसार की उन सब अद्भुत वस्तुओं का संग्रह है, जो शिकागो के प्रसिद्ध सांसारिक मेले (World's Fair) में इकट्ठी की गई थी। यहाँ यह बात यथाक्रम दिखलाई गई है कि पृथ्वी के ऊपर प्राणियों का जीवन, प्राकृतिक नियमों के अनुसार, किस प्रकार वर्तमान अवस्था को पहुँचा है। भू-गर्भविद्या-संबंधी पदार्थों को भिन्न भिन्न कमरों में दरजे-ब-दरजे रखकर उनका क्रम-विकास अच्छी तरह बतलाया गया है। यहाँ यह स्पष्ट मालूम हो जाता है कि उत्तरी अमरीका के हिरन किस प्रकार भिन्न-भिन्न चारों ऋतुओं में अपना रंग बदलते हैं। किस प्रकार प्रकृति-माता बर्फ़ के दिनों में उनको भोजन देती हैं। उत्तरीय ध्रुव में रहने वाले रीछों के बर्फ़ के भीतर बने हुए घर क्या ही अच्छी तरह दिखाए गए हैं। यहाँ यह बात प्रत्यक्ष मालूम हो जाती है कि अमरीका के प्राचीन निवासी (Red Indians) किन देवी-देवताओं की पूजा करते थे, कैसे घरों में रहा करते थे, किस प्रकार किन चीज़ों की मदद से पहनने के वस्त्र बनाते थे। उनकी नौकाएँ, उनके खाने पीने का सामान, उनके देवालय, उनके युद्ध के शस्त्र—सब चीज़ बहुत ही अच्छी तरह दिखाई गई है सबसे अधिक सक्षम प्राणी ही संसार में बाक़ी रहते हैं, इस सिद्धांत की पुष्टि इन दृश्यों को देखते ही हो जाती है। जब हमने इन चीज़ों को देखा तब तत्काल हमें यह ख़याल हो आया कि क्या भारतवासियों का नाम, उनकी चीज़, उनका इतिहास आदि सब कुछ नष्ट होकर किसी दिन लंदन के अँग्रेज़ी अजायबघर (British Museum) में ही तो न रह जाएगा? 

इस अजायबघर के मध्य में महात्मा कोलंबस की दीर्घ काय मूर्ति (Statue) विराजमान है। इस जिनोआ-निवासी को देखर दर्शक के मन में भाँति-भाँति के विचार उत्पन्न होने लगते हैं और एक अद्भुत दृश्य आँखों के सामने घूम जाता है। पुरानी अमरीका और आज की अमरीका में कितना अंतर है? वे यहाँ के प्राचीन-निवासी कहाँ गए? पिछली तीन शताब्दियों में यहाँ की भूमि का कैसा रूप बदला है। कहाँ योरप? कहाँ अमरीका? हज़ारों कोस का अंतर! भारतवर्ष की तलाश में एक पुरुष भूल से इधर आ निकलता है। उसका आना क्या है, यमराज के आने का संदेशा है! हज़ारों वर्षों से रहनेवाले, स्वतन्त्रता से विचरने वाले, क्या पशु, क्या पक्षी, क्या मनुष्य सभी तीन ही शताब्दियों के अंदर स्वाहा हो जाते हैं! करोड़ों भैंसे अमरीका के जंगलों में न जाने कब से, आनंद-पूर्वक विचरते थे पर आज उनका नामोनिशान तक नहीं मिलता। उन सब जीवों ने क्या अपराध किया था? क्यों एक दूर देश में बसने वाली जाति, जिसका कोई अधिकार इस देश पर नहीं था, आकर यहाँ के असली रहने वालों को नष्ट करने का कारण हुई? क्या यही ईश्वरीय न्याय है? नास्तिकता से भरे हुए ऐसे ही प्रश्न यहाँ दर्शक के मन में उठते हैं। तत्काल एक आवाज़ कान में आती है—प्रकृति की यह अटल सिद्धांत है कि सबसे अधिक सक्षम-सबसे अधिक योग्य ही को दुनियाँ में गुज़ारा है। यदि तुम अपना अस्तित्व चाहते हो तो अपने पास-पड़ोस वालों की बराबरी के बन जाओ। वही जाति अपना नाम संसार में स्थिर रख सकती है जो इस नियम के अनुकूल चलती है। 

इस अजायबघर में वनस्पति-विद्या, रसायन-विद्या, जंतु-विद्या, नर-शरीर-विद्या आदि भिन्न 2 विद्याओं के संबंध की सामग्री भी विद्यमान है। “एक पंथ दो काज—छुट्टी का दिन है, सैर भी कीजिए और कुछ सीखिए भी। उन्नति के कैसे अच्छे मौक़े यहाँ के निवासियों को दिए जाते हैं। बालकपन से ही खेल के बहाने यहाँ वाले इतनी वाक़फ़ियत हासिल कर लेते हैं जो हमारे देश में दस बरस स्कूल में पढ़ने से भी नहीं होती। 

अजायबघर से बाहर निकलकर देखिए, झील के किनारे किनारे, सड़क बनी है। बेंचे रखी हुई हैं। वहाँ स्त्री, पुरुष, बालक आनंद से बैठे हैं और हँस खेल रहे हैं। उनके चेहरों को देखिए—स्वतंत्रता उनके माथे पर जगमगा रही है। नवयुवक अपनी प्रियतमानों के साथ इधर से उधर, उधर से इधर, घूमते और वार्तालाप करते हुए क्या ही भले मालूम होते हैं। मिशिगन झील भी उनके इन प्रेम के भावों को देख कर प्रसन्न मालूम होती है। वह अपने स्वच्छ शीतल पवन के झोकों से उन्हें आशीर्वाद सा दे रही है। जल की तरंगे छोटे-छोटे बालकों को देखकर, उनसे मिलने के लिए बड़े आह्लाद से आगे बढ़ती हैं; परंतु तत्काल ही यह सोच कर कि शायद कुछ बेअदबी न हुई हो पीछे हट जाती है। इस समय भगवान् सूर्य अपने दिन के कार को पूर्ण कर पश्चिम की ओर गमन करते हैं। 

इस अजायबघर के सिवा और भी बहुत से स्थान शिकागो निवासियों को रविवार मनाने के लिए है। कितने ही उद्यान ऐसे हैं जहाँ 'पियानो' बाजे तथा मन बहलाने के और अनेक सामान रखे रहते हैं। वहाँ आकर लोग बैठते हैं, संगीत सुनते हैं; और आनंद-मग्न होकर घर जाते हैं। 

यहाँ एक उद्यान है जिसका नाम हम्बोल्ड पार्क है। इसमें नहर के ढंग के जल के बड़े-बड़े और कुंड हैं। उनमें जल भरा रहता है। छोटी-छोटी नावें पानी पर तैरा करती हैं। ये नावे खेल के लिए हैं। ग्रीष्म-काल में यहाँ नावों की दौड़ होती है। रविवार के दिन इन उद्यानों का दृश्य बहुत ही मनोहर हो जाता है। नवयुवक नौकाएँ खेते हुए हँसते-खेलते-गाते, जीवन का आनंद लेते हैं। एक-एक नौका पर प्राय: एक नवयुवक और एक युवती स्त्री होती है। वे सहाध्यायी मित्र, अथवा पति-पत्नी होते हैं। इस तरह की संगति इस देश में बुरी नहीं मानी जाती और न हम लोगों के देश की तरह ऐसे बुरे भाव ही इन लोगों में उत्पन्न होते हैं। स्त्रियों की बड़ी प्रतिष्ठा है। कोई बहुत ही पतित पुरुष होगा जो उनके साथ नीच व्यवहार करेगा। ऐसे पुरुष के लिए क़ानून में बड़े भारी दण्ड का विधान है। प्रायः सभी उद्यानों में ऐसे जल कुंड है। जो स्थान जिसके निकट हो वह वहीं जाकर रविवार को आनंद मनाता है। 

कोई शायद पूछे कि क्या और रोज़ वहाँ जाना मना है? ऐसा नहीं है। परंतु कारण यह है कि अधिकांश लोगों को सिवा रविवार के और रोज़ छुट्टी ही नहीं मिलती; इसलिए रविवार को ही इन उद्यानों में लोग एकत्रित होते हैं। रोज़ सिर्फ़ कहाँ कहीं टेनिस खेलते हुए स्त्री पुरुष दिखाई देते हैं। यह बात ग्रीष्मऋतु की है। जाड़ों में जब इन कुंडों का पानी जम जाता है तब वहाँ पर लोग स्केटिंग करते हैं। स्केटिंग एक प्रकार का खेल है। हर साल दिसंबर में स्केटिंग का समय होता है। बेहद जाड़ा पड़ता है, पर बालक बालिकाए इन स्थानों में नाचती हुई दिखाई देती है। 

लिंकन-उद्यान भी बहुत प्रसिद्ध है। इसमें अमरीका के विख्यात योद्धा वीर-वर ग्राण्ट की मूर्ति है। अश्वारूढ़ पाण्ड, इस देश के इतिहास के ज्ञाता को एक भयंकर युद्ध का स्मरण कराते हैं। यह युद्ध ग़ुलामों के व्यापार को बंद कराने के लिए आपस में हुआ था। अमरीका के उत्तर के लोग चाहते थे कि ग़ुलामों का व्यापार बंद हो जाए। उनका सिद्धांत था 'स्वतंत्रता की दूरी में सब आदमी बराबर है'—जीवन और स्वतंत्रता के स्वाभाविक नियमों में सबका हक़ एक-सा है। वे नहीं चाहते थे कि अमरीका जैले स्वतंत्र देश में मनुष्य भेड़-बकरियों की तरह बिके। इस सत्य सिद्धांत की रक्षा के लिए एक लोमहर्षक युद्ध उत्तर और दक्षिण निवासियों में हुआ, और परिणाम में सत्य की जय हुई। शुखबीर ग्राण्ट इस युद्ध में उत्तर वालों की ओर से सेनापति थे। वे काले हबशियों को वैसा ही चाहते थे जैसा कि गोरे चमड़े वाले अमेरिका के निवासियों को। इस महात्मा कास्मारक चिन्ह दर्शक को एक नया जीवन प्रदान करता है। वह उसे सूचना देता है कि किसी मनुष्य को दूसरे पर शासन करने का अधिकार नहीं है। सब मनुष्य इस विषय में बराबर हैं। समाज एक यंत्र की भाँति है। मनुष्य-समुदाय उसके पुरजे हैं। अपनी अपनी योग्यतानुसार सब समाज के सेवक हैं। किसी से घृणा मत करो, क्या काला, क्या गोरा, सब एक ही पिता के पुत्र हैं। 

इस उद्यान के एक भाग में भिन्न-भिन्न प्रकार के पौधे रखे हुए हैं। जो वृत्त जिस तापमान में जी सकता है उसके अनुसार वहाँ उसे उष्णता पहुँचाई गई है और उसकी रक्षा की गई है। उष्ण देशों के अनेक वृक्ष यहाँ देखने में आते हैं। दर्शक को वनस्पति-विद्या-संबंधी बहुत सी बातें यहाँ मालूम हो जाती हैं। 

उद्यानों के सिवा बहुत से और भी स्थान लोगों के बैठने-उठने, हँसने-खेलने के लिए हैं। शिकागो बहुत बड़ा नगर है। इससे नगर निवासियों के आराम और शुद्ध पान की प्राप्ति के लिए, बीच-बीच गलियों में, 'बुलावार्डज़' नामक विहार स्थल हैं। यहाँ की गलियाँ अपने देशों की जैसी नहीं हैं। गलियाँ क्या एक बाज़ार हैं। पत्थर के मकानों के आगे, दोनों किनारों पर पाँच फीट के क़रीब रास्ता सड़क से ऊँचा लोगों के चलने के लिए बना हुआ है। बीच की सड़क गाड़ी-घोड़े, मोटर आदि के लिए है। खुले मकानों और चौड़ी सड़कों के कोने पर भी, हवा साफ़ रखने और ग़रीब आदमियों के मनोरंजन तथा लाभ के लिए थोड़ी थोड़ी दूर पर विहार वाटिकाएँ हैं, जहाँ बैठने के लिए बेंचे रखी रहती हैं। काम से थके हुए स्त्री-पुरुष रोज़ सायंकाल में यहाँ दिखाई देते हैं। क्योंकि और स्थानों में गाने-बजाने और जल विहार आदि के लिए थोड़ा बहुत ख़र्च करना पड़ता है, जो थोड़ी आमदनी के लोग नहीं कर सकते। उनके लिए ऐसे स्थानों, उद्यानों और अजायबघरों में घूमने की स्वतंत्रता है। यत्न यह किया गया है कि सब को इस स्वतंत्र देश में आनंद प्राप्त करने का अवसर मिले। यहाँ जो धन व्यय किया जाता है वह, शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की उन्नति के लिए, किया जाता है। 

यह तो हुई दिन की बात, अब रात की सुनिए। यहाँ बहुत से नाटक घर प्रदर्शनियाँ और समाज हैं, जहाँ अपनी-अपनी रुचि के अनुसार लोग रात को जाते हैं। शिकागो में लोग अक्सर रात को भी गिरजों में जाते हैं। रात को भी वहाँ उपदेश, गायन और हरिकीर्तन होता है। यहाँ एक जगह 'व्हाइट सिटी' है। बहुत से लोग वहाँ जाते हैं। इस जगह को 'स्वेत-नगर' इसलिए कहते हैं कि यहाँ बिजली की शुभ्र रोशनी होती है, जिससे रात को भी दिन ही सा रहता है। इसके विशाल द्वार पर बड़े मोटे-मोटे बिजली के प्रकाश के अक्षरों में 'दि व्हाइट सिटी' (The White City) लिखा हुआ है। बिजली की महिमा यहाँ ख़ूब ही देखने को मिलती है। स्थान-स्थान पर प्रकाश मय रंग-बिरंगे अक्षर-चित्र बने हुए हैं, जो मिनट-मिनट में रंग बदलते हैं। इस श्वेत-नगर के भीतर अनेक मनोरंजक स्थान हैं; कहीं पर गाना हो रहा है; कहीं बड़े-बड़े हालों में नाच हो रहा है; सरकस का तमाशा है। दुनिया भर के तमाशा करने वाले यहाँ लाए जाते हैं। गर्मी के दिनों में वे, तीन ही चार मास में, हज़ारों रुपए कमा लेते हैं। यह स्थान एक कंपनी का है। उसके नौकर सारी दुनिया में तमाशा करनेवालों को लाने के लिए घूमा करते हैं। भारतवर्ष के यदि दो तीन अच्छे अच्छे पहलवान, किसी देशी कंपनी के साथ, अमरीका में आवे तो हज़ारों रुपए कमाकर ले जाएँ। हमारे देश में अभी लोगों ने रुपया पैदा करने का ढंग नहीं सीखा। एक साधारण मनुष्य इंगलिस्तान से आकर हिंदुस्तान में विज्ञापनों द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त करके, लाखों बटोर कर ले जाता है, परंतु हमारे स्वदेशी कारीगर, पहलवान, बाज़ीगर आदि कभी इस ओर आने का साहस नहीं करते। अमरीका में कुश्ती का शौक़ बढ़ रहा है। यदि इस समय कोई पहलवान थोड़ा सा रुपया ख़र्च करके इधर आवे और किसी अच्छी कंपनी की मारफ़त कुश्ती हो, तो लाखो रुपए के वारे न्यारे हो जाएँ। 

इस श्वेत-नगर में रविवार को बड़ा भारी मेला होता है। गाड़ियाँ स्त्री-पुरुषों से लदी हुई जाती हैं। हज़ारों दर्शक इकट्ठे होते हैं। रात के 8 बजे से 11 या 12 बजे तक मेला रहता है। यह स्थान केवल गर्मियों में खुलता है; क्योंकि जाड़ों में शीत के कारण यहाँ कोई नहीं आता। शीत ऋतु के लिए नगर के भीतर और अनेक स्थान हैं जहाँ और ही तरह के मनोरंजक मेल होते हैं। 

रविवार का दिन इस नगरी में लोग इसी तरह व्यतीत करते हैं। अब यहाँ वालों की जीवन-चर्य्या का मिलान यदि हम भारतवर्ष से करते हैं तो कितना बड़ा अंतर पाते हैं। उन तमाशों या नाटकों की बात जाने दीजिए जिनको हमारे बहुत से पाठक शायद अच्छा न समझ, पर और ऐसे कितने मनोरंजक या शिक्षाप्रद खेल तमाशे हैं जिनका हमारे स्वदेशी भाइयों को शौक़ है? वे अपने अवकाश को, अपनी छुट्टियों को, किस तरह बिताते हैं? भांग पीकर, ताश खेलकर, पतंग उड़ाकर और व्यर्थ के बकबाद में लिप्त रह कर, वक़्त की वे क़ीमत ही नहीं जानते। यद्यपि कुछ पढ़े लिखे लोग ऐसे हैं जो इन बुराइयों से बचे हुए हैं, परंतु वे तीस करोड़ की जन-संख्या में दाल में नमक के बराबर भी नहीं। आधी संख्या हमारे देश में मुर्खा स्त्रियों की है जिनको बाहर निकलने की आज्ञा ही नहीं। जहाँ के निवासी सैंकड़े पीछे आठ से भी कम साक्षर हैं। उन्हें दुर्व्यसनों में डूबने से भगवान ही बचावे। 

पाठक, यह शिकागो के एक दिन का दृश्य आपकी भेट किया गया। आशा है कि आप इससे लाभ उठाने का यज्ञ करेंगे। सोचिए तो सही, हमारे देश के करोड़ों निर्धन किस तरह जीवन जंजाल काट रहे हैं? जिन्हें हम नीच जाति के समझते हैं उन्हें किस घृणा की दृष्टि से हम देखते हैं? उनके सुख की हम कितनी परवा करते हैं? अपने घर, अपने नगर, अपनी दिन चर्य्या आदि का अन्य देशों से मुक़ाबिल कीजिए और देखिए कि इस समय हमारा कर्तव्य क्या है? वह रविवार का दृश्य आपको इसलिए नहीं दिखाया गया कि इसे देखकर आप भूल जाइए। नहीं; इससे आप कुछ सीखिए। यह दृश्य एक महान् उद्देश्य को सामने रख कर दिखाया गया है। कृपा करके, विचार तो कीजिए कि वह महान् उद्देश्य क्या है? 
 

Monday, May 8, 2023

कहानी | गुरू मंत्र | मुंशी प्रेमचन्द | Kahani | Guru Mantra | Munshi Premchand


कहानी - गुरू मंत्र

घर के कलह और निमंत्रणों के अभाव से पंडित चिंतामणिजी के चित्त में वैराग्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने संन्यास ले लिया तो उनके परम मित्र पंडित मोटेराम शास्त्रीजी ने उपदेश दिया- मित्र, हमारा अच्छे-अच्छे साधु-महात्माओं से सत्संग रहा है। यह जब किसी भलेमानस के द्वार पर जाते हैं, तो गिड़-गिड़ाकर हाथ नहीं फैलाते और झूठ-मूठ आशीर्वाद नहीं देने लगते कि 'नारायण तुम्हारा चोला मस्त रखे, तुम सदा सुखी रहो।' यह तो भिखारियों का दस्तूर है। सन्त लोग द्वार पर जाते ही कड़ककर हाँक लगाते हैं, जिससे घर के लोग चौंक पड़ें और उत्सुक होकर द्वार की ओर दौड़ें। मुझे दो-चार वाणियाँ मालूम हैं, जो चाहे ग्रहण कर लो। गुदड़ी बाबा कहा करते थे- 'मरें तो पाँचों मरें।' यह ललकार सुनते ही लोग उनके पैरों पर गिर पड़ते थे। सिद्ध बाबा की हाँक बहुत उत्तम थी- 'खाओ, पीओ, चैन करो, पहनो गहना, पर बाबाजी के सोटे से डरते रहना।' नंगा बाबा कहा करते थे- 'दे तो दे, नहीं दिला दे, खिला दे, पिला दे, सुला दे।' यह समझ लो कि तुम्हारा आदर-सत्कार बहुत कुछ तुम्हारी हाँक के ऊपर है। और क्या कहूँ। भूलना मत। हम और तुम बहुत दिनों साथ रहे, सैकड़ों भोज साथ खाये। जिस नेवते में हम और तुम दोनों पहुँचते थे, तो लाग-डाँट से एक-दो पत्तल और उड़ा ले जाते थे। तुम्हारे बिना अब मेरा रंग न जमेगा, ईश्वर तुम्हें सदा सुगंधित वस्तु दिखाये।

चिंतामणि को इन वाणियों में एक भी पसंद न आयी। बोले- मेरे लिए कोई वाणी सोचो।
मोटेराम- अच्छा यह वाणी कैसी है कि, 'न दोगे तो हम चढ़ बैठेंगे।'
चिंतामणि- हाँ, यह मुझे पंसद है। तुम्हारी आज्ञा हो तो इसमें काट-छाँट करूँ।
मोटेराम- हाँ, हाँ, करो।
चिंता.- अच्छा, तो इसे इस भाँति रखो- न देगा तो हम चढ़ बैठेंगे।
मोटेराम- (उछलकर) नारायण जानता है, यह वाणी अपने रंग में निराली है। भक्ति ने तुम्हारी बुद्धि को चमका दिया है। भला एक बार ललकारकर कहो तो देखें कैसे कहते हो।
चिंतामणि ने दोनों कान उँगलियों से बन्द कर लिये और अपनी पूरी शक्ति से चिल्लाकर बोले- न देगा तो चढ़ बैठूँगा। यह नाद ऐसा आकाशभेदी था कि मोटेराम भी सहसा चौंक पड़े। चमगादड़ घबराकर वृक्षों से उड़ गये, कुत्ते भूँकने लगे।
मोटेराम- मित्र, तुम्हारी वाणी सुनकर मेरा तो कलेजा काँप उठा। ऐसी ललकार कहीं सुनने में न आयी, तुम सिंह की भाँति गरजते हो। वाणी तो निश्चित हो गयी, अब कुछ दूसरी बातें बताता हूँ, कान देकर सुनो। साधुओं की भाषा हमारी बोलचाल से अलग होती है। हम किसी को आप कहते हैं, किसी को तुम। साधु लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबको तू कह कर पुकारते हैं। माई और बाबा का सदैव उचित व्यवहार करते रहना। यह भी याद रखो कि सादी हिंदी कभी मत बोलना; नहीं तो मरम खुल जायगा। टेढ़ी हिंदी बोलना; यह कहना कि, 'माई मुझको कुछ खिला दे' साधुजनों की भाषा में ठीक नहीं है। पक्का साधु इसी बात को यों कहेगा- माई मेरे को भोजन करा दे, तेरे को बड़ा धर्म होगा।
चिन्ता.- मित्र, हम तेरे को कहाँ तक जस गावें। तेरे ने मेरे साथ बड़ा उपकार किया है।
यों उपदेश देकर मोटेराम विदा हुए। चिन्तामणिजी आगे बढ़े तो क्या देखते हैं कि एक गाँजे-भाँग की दुकान के सामने कई जटाधारी महात्मा बैठे हुए गाँजे के दम लगा रहे हैं। चिन्तामणि को देखकर एक महात्मा ने अपनी जयकार सुनायी- चल-चल, जल्दी लेके चल, नहीं तो अभी करता हूँ बेकल।
एक दूसरे साधु ने कड़ककर कहा- अ-रा-रा-रा-धम, आय पहुँचे हम, अब क्या है गम।
अभी यह कड़ाका आकाश में गूँज ही रहा था कि तीसरे महात्मा ने गरजकर अपनी वाणी सुनायी- देस बंगाला, जिसको देखा न भाला, चटपट भर दे प्याला।
चिन्तामणि से अब न रहा गया। उन्होंने भी कड़ककर कहा- न देगा तो चढ़ बैठूँगा।
यह सुनते ही साधुजन ने चिंतामणि का सादर अभिवादन किया। तत्क्षण गाँजे की चिलम भरी गयी और उसे सुलगाने का भार पंडितजी पर पड़ा। बेचारे बड़े असमंजस में पड़े। सोचा, अगर चिलम नहीं लेता तो अभी सारी कलई खुल जायगी। विवश होकर चिलम ले ली; किन्तु जिसने कभी गाँजा न पिया हो, वह बहुत चेष्टाकरने पर भी दम नहीं लगा सकता। उन्होंने आँखें बन्द करके अपनी समझ में तो बड़े जोरों से दम लगाया। चिलम हाथ से छूट कर गिर पड़ी, आँखें निकल आयीं, मुँह से फिचकुर निकल आया, मगर न तो मुँह से धुएँ के बादल निकले, न चिलम ही सुलगी। उनका यह कच्चापन उन्हें साधु-समाज से च्युत करने के लिए काफी था। दो-तीन साधु झल्लाकर आगे बढ़े और बड़ी निर्दयता से उनका हाथ पकड़कर उठा दिया।
एक महात्मा- तेरे को धिक्कार है !
दूसरे महात्मा- तेरे को लाज नहीं आती ? साधु बना है, मूर्ख !
पंडितजी लज्जित होकर समीप के एक हलवाई की दुकान के सामने जाकर बैठे और साधु-समाज ने खँजड़ी बजा-बजाकर यह भजन गाना शुरू किया-
माया है संसार सँवलिया, माया है संसार;
धर्माधर्म सभी कुछ मिथ्या, यही ज्ञान व्यवहार;
सँवलिया, माया है संसार।
गाँजे, भंग को वजिर्त करते, हैं उन पर धिक्कार;
सँवलिया, माया है संसार।

Saturday, May 6, 2023

कहानी | जंबक की डिबिया | सुभद्रा कुमारी चौहान | Kahani | Jambak Ki Dibiya | Subhadra Kumari Chauhan


कहानी - जंबक की डिबिया 

इस जम्बक की डिबिया से मैंने एक आदमी का खून जो कर डाला है, इसलिए मैं इससे डरता हूँ। मैं जानता हूँ कि यही जम्बक की डिबिया मेरी मौत का कारण होगी-प्रोफेसर साहब ने कहा और कुर्सी पर टिक गए। उसके बाद हम सभी लोगों ने उनसे पूछा-जम्बक की डिबिया से मनुष्य की हत्या आखिर हो ही कैसे सकती है?
सिगरेट बुझाकर ऐश-ट्रे पर फेंकते हुए प्रोफेसर साहब ने कहा-बात उन दिनों की है जब मैं बी।ए। फाइनल में पढ़ता था। केठानी हमारे घर का पुराना नौकर था, बड़ा मेहनती, बड़ा ईमानदार। महीनों हमारी माँ जब घर के बाहर रहती थी, वह सारे घर की देखभाल करता था।
एक चीज भी कभी इधर से उधर न हुआ था। एक बार यही बरसात के दिन थे। मेरी छोटी बहिन के शरीर पर लाल-लाल दाने से उठ आए थे औए उसके लिए मैं एक जम्बक की डिबिया खरीद लाया। मेरी माँ मशीन के सामने बैठी कपड़े सी रही थी। आसपास बहुत से कपड़े पड़े थे। वहीं मैंने वह डिब्बी खोली। भीं के दानों पर जहाँ-तहाँ लगाया और डिब्बी माँ के हाथ में दे दी। पास हीं केठानी खड़ा-खड़ा धुले हुए कपड़ों की तह लगा रहा था। जब मैं बहिन के दानों पर जम्बक लगा चुका तब केठानी ने उत्सुकता से पूछा- "काय भैया! ई से ई सब अच्छो हुई जई हैं?"
मैंने कहाँ- हाँ खाज़, फोड़ा, फुंसी, जले-कटे सब जगह यह दवा काम आती है। इसके बाद केठानी अपने काम में लग गया और मैं बाहर चला गया।
शाम को जब मैं घूम कर लौटा तो देखा घर में एक अजीब प्रकार की चहल-पहल है। माँ कह रही थी- बिना देखे कैसे किसी को कुछ कहा जा सकता है। कहाँ गई? कौन जाने।
बड़ी बहिन कह रही थी- उसे छोड़कर और ले हीं कौन सकता है। कल उसकी भावज आई थी न। उसके लड़के के सिर में भी बहुत सारी फुंसियाँ थीं।
पिताजी कह रहे थे- कहीं महराजिन न ले गई हो। अखिल उससे कह रहा था यह गोरे होने की दवा है। लड़के भी तो तुम्हारे सीधे नहीं हैं।
पास हीं बैठा अखिल पढ़ रहा था। पिताजी की बात में दिलचस्पी लेते हुए वह बोला- बापू, महराजिन तो हमेशा गोर होने की ही फिकर में रहती है। फिर मुझसे पूछा कि यह क्या है, सो मैंने भी कह दिया कि गोरे होने की दवा है।
केठानी अपनी कोठरी में रोटी बना रहा था। उसे बुलाकर पूछा गया तो उसने कहा- जब भैया लगाई हती आपने तो तबै देखी रही, फिर हम नहीं देखन सरकार।
मुझे क्रोध आ गया, बोला- तो डिबिया पंख लगाकर उड़ गई? केठानी ने मेरी तरफ़ देखा, बोला- भैया...
मैंने कहा चुप हो! मैं कुछ नहीं सुनना चाहता। सुबह मैं डिब्बी लाया और इस समय गायब हो गई। यह सब तुम्हीं लोगों की बदमाशी है।
केठानी कुछ न बोला वहीं खड़ा रहा और मैं अपने कमरे में चला गया। मैंने सुना- वह माँ से कह रहा था- मालकिन चल के मोर कोठरी खोली देख लेई-मैं का करिहौं दवाई ले जाई के? फिर जऊन चीज लागी मैं मांग न लईहौं सरकार से?
मैं कोट उतार रहा था। न जाने मुझे क्यों क्रोध आ गया और कमरे से निकल कर बोला- चले जाओ अपना हिसाब लेकर- हमे तुम्हारी ज़रूरत नहीं है-- आखिर माँ ने बहुत समझाया पर हम सब भाई-बहिन न माने और माँ ने केठानी को बहुत रोकना चाहा और वह यही कहता रहा- जब तक भैया माफ़ न कर देंगे, अपने मुँह से मुझसे रुकने को न कहेंगे, मैं न रहूँगा।
और मैंने न केठानी से रुकने को कहा न वह रुका, हमारे घर की नौकरी छोड़कर वह चला गया। पर घर के सब लोगों को वह प्यार करता था। वह गया ज़रूर पर तन से गया मन से नहीं। माँ को भी उसका अभाव बहुत खटका और मुझे तो सबसे ज्यादा उसका अभाव खटका। वह मेरे कमरे को साफ रखता था, सजाकर रखता था, फूलों का गुलदस्ता नियम से बनाकर रखता था। मेरी जरूरते बिना बताये समझ जाता और पूरी करता था, पर जिद्दी स्व्हाव के कर्ण चाहते हुए भी मैं माँ से कह न सका कि केठानी को बुला लो जोकि मैं ह्रदय से चाहता था। एक दिन माँ ने कहा कि केठानी रायसाहब के बंगले पर गारा-मिट्टी का काम करता है।मैंने सुना, मेरे दिल पर ठेस लगी। बूढ़ा आदमी, डगमग पैर, भला वह गारा-मिट्टी का काम कैसे कर सकेगा? फिर भी चाहा की यदि माँ कहे की केठानी को बुला लेती हूँ तो मैं इस बार ज़रूर कह दूंगा की हाँ बुला लो पर इस बार माँ ने केवल उसके गारा-मिट्टी धोने की खबर भर दी और उसे फिर से नौकर रखने का प्रस्ताव न किया। एक दिन मैं कॉलेज जा रहा था। देखा केठानी सिर पर गारे का तसला रखे चाली पर से कारीगरों को दे रहा है। चालीस फुट ऊपर चाली पर चढ़ा आह बूढ़ा केठानी, खड़ा काम कर रहा था। मेरी अंतरात्मा ने मुझे काटा। यह सब मेरे कारण है और मैंने निश्चय कर लिया कि शाम को लौट कर माँ से कहूँगा अब केठानी को बुला लो। वह बहुत बूढ़ा और कमजोर हो गया है। इतनी कड़ी सजा उसे न मिलनी चाहिए। दिन भर मुझे उसका ख्याल बना रहा। शाम ज़रा जल्दी लौटा। रास्ते पर हीं रायसाहब का घर था। मजदूरों में विशेष प्रकार की हलचल थी। सुना कि एक मजदूर चाली पर से गिरकर मर गया। पास जाकर देखा वह केठानी था। मेरा ह्रदय एक आदमी की हत्या के बोझ से बोझिल हो उठा। घर आकर माँ से सब कुछ कहा- "माँ उसके कफ़न के लिए कोई नया कपड़ा निकाल दो!"
माँ अपने सीने वाली पोटली उठा लायीं। नया कपड़ा निकलने के लिए उन्होंने ज्यों हीं पोटली खोली जम्बक की डिबिया खट से गिर पड़ी।

Charles Perrault

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