Wednesday, March 1, 2023

कहानी | राजकुमारी हिमांगिनी | महावीर प्रसाद द्विवेदी | Kahani | Rajkumari Himangini | Mahavir Prasad Dwivedi


कहानी - राजकुमारी हिमांगिनी

पर्वत के सबसे ऊंचे शिखर पर राजकुमारी हिमांगिनी ने अपना घर बनाया। संसार के साधारण जीवों के पास रहना, या उनके साथ हंसना-खेलना उसे जरा भी पसंद न आया।

‘‘सुंदरता और गोरेपन में मैं अपना सानी नहीं रखती; फिर मैं राजकुमारिका हूं। तब भला क्यों मैं मामूली लोगों के पास बैठना पसंद करूं? संसारी जीवों की संगति मुझे जरूर अपवित्र कर डालेगी।’’ इस तरह अपने मन में सोच-विचारकर वह पहाड़ों की तरफ चली। वहां सबसे ऊंचे पहाड़ की चोटी पर वह जा बैठी। वहां रहते उसे कई युग बीत गए। अपनी चमक-दमक और रूप-रंग के गर्व से फूली नहीं समाई।

चिरकाल तक वह वहीं सर्वांग शीतल अवयवों और सुंदरता के मद से मतवाली रही।उसका समय का रूप सफेद कमल के समान सुंदर वस्त्र धारण किए हुए नई वधू के रूप को भी मात करता था। पर वहां एकांत में अकेली रहते-रहते वह ऊब उठी। धीरे-धीरे उसे दूसरे की संगति की चाहत हुई। कुछ दिनों में, क्रम-क्रम से, उसकी उत्सुकता बढ़ गई। उसने विवाह करना चाहा। पर उसके पाणिग्रहण का सौभाग्य प्राप्त हो किसे? उसे खुद ही न मालूम था कि कौन ऐसा भाग्यवान् युवक है जिसे उसका यौवन-रत्न प्राप्त हो सकेगा। मारूत महाराज, पवन देव, झकोर सिंह इत्यादि राजों और राजकुमारों ने उसके साथ अनेक प्रेमलाप किए; हर प्रयत्न से उसका चित्त अपनी ओर आकर्षित करना चाहा, पर सब व्यर्थ हुआ। उनमें से एक को उसने पसंद न किया। उसकी समझ में उन सबका प्रेम दो ही चार दिनों का था। ऐसे कच्चे प्रेमियों को कौन कुमारिका अपना सर्वस्व दे डालने का साहस करेगी?

जलदेन्द्र बहादुर सिंह तक हिमांगिनी के प्रेम के भिखारी हुए। उन्होंने उसके पास कई दूतियां भी भेजीं। उन्होंने उसकी विरह-कथा की कहानियां, खूब नमक-मिर्च लगाकर, कही। वे अपने साथ पहनने-ओढ़ने की कुछ चीजें भी उपहार के तौर पर लाईं। उनको हिमांगिनी अब तक धारण किए हुए हैं। पर जलदेन्द्र भी उसे पसंद न आए। पुरुषत्व के गुणों की उनमें जरा कमी नजर आई। पुरुष वह है जिसमें शक्ति भी हो, कठोरता भी हो, धैर्य भी हो और समय पर दुःख, क्लेश या दूसरों की दो-चार बातें सहने का भी सामर्थ्य हो। इन सब गुणों के न होने से हिमांगिनी ने उसकी भी प्रार्थना स्वीकार न की। क्या करे? बेचारी चुपचाप अपने घर बैठी रही। उसका भव्य वेश, उसका रूप-लावण्य और उसका गर्वव्यंजक चेहरा देखने लायक था। पर यौवन की ऊष्मा उसमें न थी; उसका बदन ठंडी बर्फ के समान ठंडा था। इसी से उसे देखकर तबीयत खुश नहीं होती थी; जान पड़ता था कि उसका शरीर निर्जीव है।

यथासमय वसंत ऋतु आई। बादल जहां के तहां उड़ गए। आसपास साफ हो गया। इतने में अनायास एक बड़ा ही सुरूपवान् और गौरवर्ण युवा पहाड़ की चोटी पर दिखाई दिया। अहा, उसकी मुसकान जादू से भरी हुई थी। उसे देखते हिमांगिनी का दिल हाथ से जाता रहा। जानते हो वह कौन था? उस नवयुवक का नाम था भुवन भास्कर सिंह। राजकुमारी हिमांगिनी ने अभी अच्छी तरह उसे देखा भी न था कि वह उसके हाथ बिक-सी गई। अपना शरीर, उसका मन, अपना प्राण, अपना सर्वस्व, सभी उसने उसे दे डाला। प्रेमोन्माद की गर्मी से व्याकुल होकर वह सहसा पीली पड़ गई। ऐसा पीलापन उसमें पहले कभी नहीं देखा गया था। पाण्डु और कमला रोग का रोगी भी इतना पीला नहीं पड़ जाता। उसका पत्थर के समान सख्त कलेजा भीतर-ही-भीतर पिघल उठा। उसकी आंखों से आंसू की झड़ी लग गई। उसकी अजब हालत हो गई। एक प्रकार के आतंक, भय और घबराहट ने उसको घेर लिया। वह कांपने-सी लगी। उसके सजीव होने और चलने-फिरने की शक्ति रखने का यह पहला चिह्न था।

हिमांगिनी ने अपने पीले और मुरझाए हुए चेहरे को ऊपर उठाया और कांपते हुए होंठों के बीच से निकलनेवाली लड़खड़ाती हुई आवाज से उस नवयुवक से उसने वार्तालाप आरंभ किया। प्रेम-विह्वल होने पर बलवान् पुरुषों की भी अक्ल ठिकाने नहीं रहती। फिर अबला स्त्रियों की क्या कथा? इस अवसर पर संकोच और सलज्जता ने हिमांगिनी को प्रगल्भता के भरोसे अपने घर का रास्ता लिया। तब प्रगल्भता के समझाने-बुझाने पर उसे बोलने का साहस हो आया। उसने मुसकुराते हुए भुवन भास्कर से इस प्रकार प्रार्थना की-

‘‘हे मनोहरी युवक, तुम चाहे जो हो; तुमने मेरे धैर्य का सर्वथा नाश कर दिया। मुझे यहां रहते अनेक युग हो गए। अब तक मैं यहीं एकांत में चुपचाप अपनी आयु क्षीण करती रही। मैं आज तक यह न जान सकी कि किस तरह अपनी उम्र आराम से काटूं। आज तुम्हारे सुंदर मुख-कमल की ओर एक ही बार निहारने से मैंने यह चीज पा ली जिसकी खोज मुझे हजारों वर्ष से थी। मैं आपकी हो चुकी। मैंने इसी क्षण से अपना हृदय आपको दे डाला। मैं अपना सर्वस्व आपको अर्पण कर चुकी। मुझ पर अब आप दया करें। मेरी तरफ सकरुण दृष्टि से देखिए। मैं एक अनाथ, निराश्रय, निराश चिर-कुमारिका हूं। मेरा जीवन आज तक बिलकुल ही नीरस, निष्फल और कड़वा रहा। अब आप उसे सरस, सफल और मधुर कर देने की कृपा कीजिए।’’

यह सुनकर भुवन भास्कर ने शिष्टता और प्रेमपूर्ण कोमल वचनों से इस प्रकार उत्तर दिया-

‘‘स्वच्छ, निष्कलंक और सुंदर कुमारिके। तुम्हारी कांति, तुम्हारे रूप-रंग और तुम्हारे टटकेपन ने मुझे प्रसन्न किया; तुम्हारे एकांतवास ने मुझे खिन्न किया; पर तुम्हारे ठंडे और कठोर स्वभाव ने मुझे मार ही डाला। आज तक तुमने अपना जीवन उदासीनता और एकांतवास में बुरी तरह काटा। प्रेम और जीवन के तत्त्व पर तुमने जरा भी विचार नहीं किया। उदासीनता और एकांतवास को तुमने इसलिए स्वीकार किया कि प्रेम से तुम पीड़ित आ गई थी; या जीवन से तुम निराश हो गई थी। घमंड में आकर तुमने एकांतवास पसंद किया। दुनिया की नाट्यशाला में होनेवाले हजारों तरह के प्रेम-पूर्ण अभिनयों से दूर भागकर यहां, इस पहाड़ की चोटी पर, सबसे अलग रहने के इरादे से, तुम आ बैठी। क्या तुम नहीं जानती कि पहाड़ों का प्रेम वृक्ष के मधुर फल चखने को नहीं मिलते? प्रेम में उष्णता है; तुममें शीतलता। प्रेम प्रवाही है-वह बहकर अपने पात्र तक पहुंचता है। तुम जड़ हो, हजार प्रयत्न करने पर भी तुम अपनी जगह नहीं छोड़ती। फिर, तुम्हीं कहो, इस दशा में, किस प्रकार तुम किसी की प्रेमपात्र हो सकती हो?

‘‘अगर तुम मेरी वधू होना चाहती हो, मेरे प्रेम की प्रियतम पात्र बनना चाहती हो; तो तुम भी मेरे समान हो जाओ। उस उष्णता प्राप्त करो; अपने कड़ेपन को छोड़ी; प्रवाही बन जाओ; इन सुनसान पहाड़ों से नीचे उतरकर बस्ती में चलो। यदि तुम मेरे सुख-दुःख में शामिल होने की इच्छा रखती हो तो जो काम मैं करता हूं वही तुम भी करना सीखो। मैं आकाश को प्रकाशित करता हूं; तुम पृथ्वी को अपने लावण्य से प्रकाशित करती हुईं उसमें नरमी पैदा करो। उसे सरसब्ज और उपजाऊ बनाओ। तुमने अपने पास जो अनमोल चीजें छिपा रखी हैं उनको, राह में, जो कोई तुम्हें मिले, उसे, परोपकार करने के इरादे से, देती जाओ। सांसारिक भार को उठा लो। उसके सुख-दुःख में और हानि-लाभ में शामिल हो जाओ। सबसे हेल-मेल रखो और अपने पवित्र आचरण से सबको पवित्र करो।’’

इस प्रकार सम्भाषण करके भुवन भास्कर ने कुमारी हिमांगिनी का चुंबन बड़े ही प्रेम से किया। उसके स्पर्श से हिमांगिनी को परमानंद हुआ और वह तत्काल अपने प्रेमी की आज्ञा पालन करने के लिए प्रस्तुत हो गई। वह वहां से कूद पड़ी और ऊंची-ऊची पहाड़ियों और घाटियों को पार करके पहाड़ के नीचे उतर आई। वहां से वह उछलती-कूदती आगे बढ़ी। उसने अपने दिल में ठान लिया कि जब तक मैं सागर सिंह के दर्शन न कर लूंगी तब तक मैं हरगिज बीच में कहीं न ठहरूंगी।

हिमांगिनी ने अपना प्रण पूरा कर दिखाया, इसलिए उस पर प्रसन्न होकर सायंकाल, सागर सिंह के यहां आकर भुवन भास्कर ने यथाविधि उसका पाणिग्रहण किया। तब से हिमांगिनी वहीं रहने लगी। हर रोज रात को, अपनी प्रेमी भुवन भास्कर से मिलकर परमानंद का अनुभव करने लगी।

Monday, February 13, 2023

यात्रा वृतांत | लखनऊ | भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Yatra Vritant | Lucknow | Bhartendu Harishchandra


यात्रा वृतांत- लखनऊ

श्रीमान् क.व. सुधा संपादक महोदयेषु !
 
मेरे लखनऊ गमन का वृतांत निश्चय आप के पाठकगणों को मनोरंजक होगा। कानपुर से लखनऊ आने के हेतु एक कंपनी अलग है इसका नाम अ. रू. रे. कंपनी है इसका काम अभी नया है और इसके गार्ड इत्यादिक सत्र काम चलाने वाले हिंदूस्तानी है। स्टेशन कान्हपुर का तो दरिद्र सा है पर लखनऊ का अच्छा है। लखनऊ के पास पहुँचते ही मस्जिदों के ऊँचे 2 कंगूर दूर ही से दिखाते है, परंतु नगर में प्रवेश करते ही एक बड़ी विपत आ पड़ती है, वह यह है कि चुंगी के राक्षसों का मुख देखना होता हैं हम लोग ज्यों ही नगर में प्रवेश करने लगे जमदूतों ने रोका सब गठरियों को खोल-खोल के देखा जब कोई वस्तु न निकसी तब अगूठियों पर (जो हम लोगों के पास थी) आ झुके बोले इसका महसूल दे जाओ हम लोग उतर के चौकी गए वहाँ एक ठिंगना सा काला रुखा मनुष्य बैठा था नटखटपन उस के मुखरे से बरसता था मैंने पूछा क्यौं साहब बिना बिकरी की वस्तुओं पर भी महसूल लगता है, बोले हाँ। काग़ज़ देख लिजिए छपा हुआ हैं मैंने काग़ज़ देखा उसमें भी यही छापा था मुझे पढ़ के यहाँ की गवन्मेंट के इस अन्याय पर बड़ा दुख हुआ मैंने उन से पूछा कि कहिए कितना महसूल दूँ आप नाक और गाल फुला के होले कि मैं कुछ जवहिरी नहीं हूँ कि इन अगूठियों का दाम जानू मोहर कर के गोदाम को भेजूँगा वहाँ सुपरेडेंट साहब साँझ को आकर दाम लगावैंगे। मैंने कहा कि साँझ तक भूखों कौन मरैगा बोले इस से मुझे क्या कहाँ तक लिखूँ इस दुष्ट ने हम लोगों को बहुत छकाया अंत में मुझे क्रोध आय तब मैंने इस को नृसिंह रुप दिखाया और कहा कि मैं तेरी रिपोर्ट करुँगा पहिले तो आप भी बिगड़े, पीछे ढीले हुए, बोले अच्छा जो आप के धर्म में आवै दे दीजिए तीन रुपये देकर प्राण बचे तब उनके सिपाहयों ने इनाम माँगा मैंने पूछा क्या इसी घंटो दुख देने का इनाम चाहिए किसी प्रकार इस विपत से छूट कर नगर में आए। नगर पुराना तो नष्ट हो गया है जो बचा है वह नई सड़क से इतना नीचा है कि पाताल लोक का नमूना सा जान पड़ता है मस्जिद बहुत सी हैं गलियाँ सकरी और कीचड़ से भरी हुई बुरी गंदी दुर्गंधमय। सड़क के घर सुथरे बने हुए हैं नई सड़क बहुत चौड़ी और अच्छी है जहाँ पहिले जौहरी बाज़ार और मौनाबाज़ार था वहाँ गदहे चरते हैं और सब इमामबाड़ो में किसी में डाकघर कहीं अस्पताल कहीं छापाख़ाना हो रहा है रुमी दर्वाज़ा नवाब आसिफुदोला की मस्जिद और मच्छीभवन का सर्कारी किला बना है बेदमुश़्क के हौजों में गोरे मूतते हैं केवल दो स्थान देखने योग्य बचे हैं पहिला हुसैनाबाद और दूसरा केसर बाग़। हुसैनाबाद के फाटक बाहर एक षट्कोण तालाब सुंदर बना है और एक बारहदर भी उसके ऊपर है और हुसैनाबाद के फाटक के भीतर एक नहर बनी है और बाई ओर ताजगंज का सा एक कमरा बना हुआ है वह मकान जिस्में बादशाह गड़े है देखने योग्य है बड़े बड़े कई सुंदर झाड़ रखे हुए है और इस हुसैनाबाद के दीवारो में लोहे के गिलास लगाने के इतने अंकुड़े लगे है कि दीवार काली हो रही है केसर बाग भी देखने योग्य है सुनहरे शिखर धूप में चमकते है बीच में एक बारदार रामणीय बनी है और चारों ओर अनेक सुंदर 2 बंगले बने हैं जिसका नाम लंका है उसमे कचहरी होती है और औध के तअल्लुकेदारों को मिले हैं जहाँ मोती लुटते हैं घूल उड़ती है यहाँ एक पीपल का पेड़ श्वेत रंग का देखने योग्य है। 

यहाँ के हिंदू रईस धनिक लोग असभ्य हैं और पुरानी बातैं उनके सिर में भरी हैं मुझ से जो मिला उस ने मेरी आमदनी गाँव रुपया पहिले पूछा और नाम पीछे बरन बहुत से आदमा संग में न लाने की निंदा सब ने किया पर जो लोग शिक्षित हैं वे सभ्य हैं परंतु रंडियों प्रायः सब के पास नौकर हैं और मुस्लमान सब बाह्य सभ्य हैं बोलने में बड़े चतुर हैं यादि कोई भीख माँगता है या फल बेंचता है तो वह भी एक अच्छी चाल से थोड़ी अवस्था के पुरुषों में भी स्त्रीपन झलकता हैं बातैं यहाँ की बड़ी लंबी चौड़ी बाहर से स्वचछ पर भीतर से मलीन स्त्रियाँ सुंदर तो ऐसी वहीं पर आँख लड़ाने में बड़ी चतुर यहाँ भंगोड़िने रंडियों के भी कानन काटती हैं हुक्के की भंग की दूकानों पर सज के बैठती हैं और नीचे चाहने वालो की भीड़ खड़ी रहती है पर सुंदर कोई नही। 

और भी यहाँ अमीनाबाह हज़रतगंज सौदागरों की दूकाने, चौक, मुनशी नवलकिशोर का छापाख़ाना और नवाब मशकूरुद्दौला की चित्र की दूकान इत्यादि स्थान देखने योग्य हैं। 

जैसा कुछ हैं फिर भी अच्छा है। 

ईश्वर यहाँ के लोगों को विद्या का प्रकाश दें और पुरानी बातें ध्यान से निकालें। 

आप का चिरानुगत 

यात्री 

(कविवचन सुधा खण्ड-2, अंक 22, श्रावण कृष्ण 30 सम्वत 1922 में संपादक को लिखा गया पत्र जिसमें भेजने वाले का नाम एक यात्री लिखा है। भारतेन्दु का यह भी एक उपनाम है।)

Monday, February 6, 2023

कहानी | गुप्त धन | मुंशी प्रेमचन्द | Kahani | Gupt Dhan | Munshi Premchand



कहानी - गुप्त धन
            

बाबू हरिदास का ईंटों का पजावा शहर से मिला हुआ था। आसपास के देहातों से सैकड़ों स्त्री-पुरुष, लड़के नित्य आते और पजावे से ईंट सिर पर उठा कर ऊपर कतारों से सजाते। एक आदमी पजावे के पास एक टोकरी में कौड़ियाँ लिए बैठा रहता था। मजदूरों को ईंटों की संख्या के हिसाब से कौड़ियाँ बाँटता। ईंटें जितनी ही ज्यादा होतीं उतनी ही ज्यादा कौड़ियाँ मिलतीं। इस लोभ में बहुत से मजदूर बूते के बाहर काम करते। वृद्धों और बालकों को ईंटों के बोझ से अकड़े हुए देखना बहुत करुणाजनक दृश्य था। कभी-कभी बाबू हरिदास स्वंय आ कर कौड़ीवाले के पास बैठ जाते और ईंटें लादने को प्रोत्साहित करते। यह दृश्य तब और भी दारुण हो जाता था जब ईंटों की कोई असाधारण आवश्यकता आ पड़ती। उसमें मजूरी दूनी कर दी जाती और मजूर लोग अपनी सामर्थ्य से दूनी ईंटें ले कर चलते। एक-एक पग उठाना कठिन हो जाता। उन्हें सिर से पैर तक पसीने में डूबे पजावे की राख चढ़ाये ईंटों का एक पहाड़ सिर पर रखे, बोझ से दबे देख कर ऐसा जान पड़ता था मानो लोभ का भूत उन्हें जमीन पर पटक कर उनके सिर पर सवार हो गया है। सबसे करुण दशा एक छोटे लड़के की थी जो सदैव अपनी अवस्था के लड़कों से दुगनी ईंटें उठाता और सारे दिन अविश्रांत परिश्रम और धैर्य के साथ अपने काम में लगा रहता। उसके मुख पर ऐसी दीनता छायी रहती थी, उसका शरीर इतना कृश और दुर्बल था कि उसे देख कर दया आ जाती थी। और लड़के बनिये की दूकान से गुड़ ला कर खाते, कोई सड़क पर जानेवाले इक्कों और हवागाड़ियों की बहार देखता और कोई व्यक्तिगत संग्राम में अपनी जिह्वा और बाहु के जौहर दिखाता, लेकिन इस गरीब लड़के को अपने काम से काम था। उसमें लड़कपन की न चंचलता थी, न शरारत, न खिलाड़ीपन, यहाँ तक कि उसके ओंठों पर कभी हँसी भी न आती थी। बाबू हरिदास को उसकी दशा पर दया आती। कभी-कभी कौड़ीवाले को इशारा करते कि उसे हिसाब से अधिक कौड़ियाँ दे दो। कभी-कभी वे उसे कुछ खाने को दे देते।

एक दिन उन्होंने उस लड़के को बुला कर अपने पास बैठाया और उसके समाचार पूछने लगे। ज्ञात हुआ कि उसका घर पास ही के गाँव में है। घर में एक वृद्धा माता के सिवा कोई नहीं है और वह वृद्धा भी किसी पुराने रोग से ग्रस्त रहती है। घर का सारा भार इसी लड़के के सिर था। कोई उसे रोटियाँ बना कर देने वाला भी न था। शाम को जाता तो अपने हाथों से रोटियाँ बनाता और अपनी माँ को खिलाता था। जाति का ठाकुर था। किसी समय उसका कुल धन-धान्य सम्पन्न था। लेन-देन होता था और शक्कर का कारखाना चलता था। कुछ जमीन भी थी किन्तु भाइयों की स्पर्धा और विद्वेष ने उसे इतनी हीनावस्था को पहुँचा दिया कि अब रोटियों के लाले थे। लड़के का नाम मगनसिंह था।
हरिदास ने पूछा- गाँववाले तुम्हारी कुछ मदद नहीं करते?
मगन- वाह, उनका वश चले तो मुझे मार डालें। सब समझते हैं कि मेरे घर में रुपये गड़े हैं।
हरिदास ने उत्सुकता से पूछा- पुराना घराना है, कुछ-न-कुछ तो होगा ही। तुम्हारी माँ ने इस विषय में तुमसे कुछ नहीं कहा ?
मगन- बाबूजी नहीं, एक पैसा भी नहीं। रुपये होते तो अम्माँ इतनी तकलीफ क्यों उठातीं।

बाबू हरिदास मगनसिंह से इतने प्रसन्न हुए कि मजूरों की श्रेणी से उठा कर अपने नौकरों में रख लिया। उसे कौड़ियाँ बाँटने का काम दिया और पजावे में मुंशी जी को ताकीद कर दी कि इसे कुछ पढ़ना-लिखना सिखाइए। अनाथ के भाग्य जाग उठे।
मगनसिंह बड़ा कर्त्तव्यशील और चतुर लड़का था। उसे कभी देर न होती, कभी नागा न होता। थोड़े ही दिनों में उसने बाबू साहब का विश्वास प्राप्त कर लिया। लिखने-पढ़ने में भी कुशल हो गया।
बरसात के दिन थे। पजावे में पानी भरा हुआ था। कारबार बंद था। मगनसिंह तीन दिनों से गैरहाजिर था। हरिदास को चिंता हुई, क्या बात है, कहीं बीमार तो नहीं हो गया, कोई दुर्घटना तो नहीं हो गयी ? कई आदमियों से पूछताछ की, पर कुछ पता न चला ! चौथे दिन पूछते-पूछते मगनसिंह के घर पहुँचे। घर क्या था पुरानी समृद्धि का ध्वंसावशेष मात्र था। उनकी आवाज सुनते ही मगनसिंह बाहर निकल आया। हरिदास ने पूछा- कई दिन से आये क्यों नहीं, माता का क्या हाल है ?
मगनसिंह ने अवरुद्ध कंठ से उत्तर दिया- अम्माँ आजकल बहुत बीमार है, कहती है अब न बचूँगी। कई बार आपको बुलाने के लिए मुझसे कह चुकी है, पर मैं संकोच के मारे आपके पास न आता था। अब आप सौभाग्य से आ गये हैं तो जरा चल कर उसे देख लीजिए। उसकी लालसा भी पूरी हो जाय।
हरिदास भीतर गये। सारा घर भौतिक निस्सारता का परिचायक था। सुर्खी, कंकड़, ईंटों के ढेर चारों ओर पड़े हुए थे। विनाश का प्रत्यक्ष स्वरूप था। केवल दो कोठरियाँ गुजर करने लायक थीं। मगनसिंह ने एक कोठरी की ओर उन्हें इशारे से बताया। हरिदास भीतर गये तो देखा कि वृद्धा एक सड़े हुए काठ के टुकड़े पर पड़ी कराह रही है।
उनकी आहट पाते ही आँखें खोलीं और अनुमान से पहचान गयी, बोली- आप आ गये, बड़ी दया की। आपके दर्शनों की बड़ी अभिलाषा थी, मेरे अनाथ बालक के नाथ अब आप ही हैं। जैसे आपने अब तक उसकी रक्षा की है, वह निगाह उस पर सदैव बनाये रखिएगा। मेरी विपित्त के दिन पूरे हो गये। इस मिट्टी को पार लगा दीजिएगा। एक दिन घर में लक्ष्मी का वास था। अदिन आये तो उन्होंने भी आँखे फेर लीं। पुरखों ने इसी दिन के लिए कुछ थाती धरती माता को सौंप दी थी। उसका बीजक बड़े यत्न से रखा था; पर बहुत दिनों से उसका कहीं पता न लगता था। मगन के पिता ने बहुत खोजा पर न पा सके, नहीं तो हमारी दशा इतनी हीन न होती। आज तीन दिन हुए मुझे वह बीजक आप ही आप रद्दी कागजों में मिल गया। तब से उसे छिपा कर रखे हुए हूँ, मगन बाहर है। मेरे सिरहाने जो संदूक रखी है, उसी में वह बीजक है। उसमें सब बातें लिखी हैं। उसी से ठिकाने का भी पता चलेगा। अवसर मिले तो उसे खुदवा डालिएगा। मगन को दे दीजिएगा। यही कहने के लिए आपको बार-बार बुलवाती थी। आपके सिवा मुझे किसी पर विश्वास न था। संसार से धर्म उठ गया। किसकी नीयत पर भरोसा किया जाय।

हरिदास ने बीजक का समाचार किसी से न कहा। नीयत बिगड़ गयी। दूध में मक्खी पड़ गयी। बीजक से ज्ञात हुआ कि धन उस घर से 500 डग पश्चिम की ओर एक मंदिर के चबूतरे के नीचे है।
हरिदास धन को भोगना चाहते थे, पर इस तरह कि किसी को कानों-कान खबर न हो। काम कष्ट-साध्य था। नाम पर धब्बा लगने की प्रबल आशंका थी जो संसार में सबसे बड़ी यंत्रणा है। कितनी घोर नीचता थी। जिस अनाथ की रक्षा की, जिसे बच्चे की भाँति पाला, उसके साथ विश्वासघात ! कई दिनों तक आत्म-वेदना की पीड़ा सहते रहे। अंत में कुतर्कों ने विवेक को परास्त कर दिया। मैंने कभी धर्म का परित्याग नहीं किया और न कभी करूँगा। क्या कोई ऐसा प्राणी भी है जो जीवन में एक बार भी विचलित न हुआ हो। यदि है तो वह मनुष्य नहीं, देवता है। मैं मनुष्य हूँ। मुझे देवताओं की पंक्ति में बैठने का दावा नहीं है।
मन को समझाना बच्चे को फुसलाना है। हरिदास साँझ को सैर करने के लिए घर से निकल जाते। जब चारों ओर सन्नाटा छा जाता तो मंदिर के चबूतरे पर आ बैठते और एक कुदाली से उसे खोदते। दिन में दो-एक बार इधर-उधर ताक-झाँक करते कि कोई चबूतरे के पास खड़ा तो नहीं है। रात की निस्तब्धता में उन्हें अकेले बैठे ईंटों को हटाते हुए उतना ही भय होता था जितना किसी भ्रष्ट वैष्णव को आमिष भोजन से होता है।
चबूतरा लम्बा-चौड़ा था। उसे खोदते एक महीना लग गया और अभी आधी मंजिल भी तय न हुई। इन दिनों उनकी दशा उस पुरुष की-सी थी जो कोई मंत्र जगा रहा हो। चित्त पर चंचलता छायी रहती। आँखों की ज्योति तीव्र हो गयी थी। बहुत गुम-सुम रहते, मानो ध्यान में हों। किसी से बातचीत न करते, अगर कोई छेड़ कर बात करता तो झुँझला पड़ते। पजावे की ओर बहुत कम जाते। विचारशील पुरुष थे। आत्मा बार-बार इस कुटिल व्यापार से भागती, निश्चय करते कि अब चबूतरे की ओर न जाऊँगा, पर संध्या होते ही उन पर एक नशा-सा छा जाता, बुद्धि-विवेक का अपहरण हो जाता। जैसे कुत्ता मार खा कर थोड़ी देर के बाद टुकड़े की लालच में जा बैठता है, वही दशा उनकी थी। यहाँ तक कि दूसरा मास भी व्यतीत हुआ।
अमावस की रात थी। हरिदास मलिन हृदय में बैठी हुई कालिमा की भाँति चबूतरे पर बैठे हुए थे। आज चबूतरा खुद जायगा। जरा देर तक और मेहनत करनी पड़ेगी। कोई चिंता नहीं। घर में लोग चिंतित हो रहे होंगे। पर अभी निश्चित हुआ जाता है कि चबूतरे के नीचे क्या है। पत्थर का तहखाना निकल आया तो समझ जाऊँगा कि धन अवश्य होगा। तहखाना न मिले तो मालूम हो जायगा कि सब धोखा ही धोखा है। कहीं सचमुच तहखाना न मिले तो बड़ी दिल्लगी हो। मुफ्त में उल्लू बनूँ। पर नहीं, कुदाली खट-खट बोल रही है। हाँ, पत्थर की चट्टान है। उन्होंने टटोल कर देखा। भ्रम दूर हो गया। चट्टान थी। तहखाना मिल गया; लेकिन हरिदास खुशी से उछले-कूदे नहीं।
आज वे लौटे तो सिर में दर्द था। समझे थकान है। लेकिन यह थकान नींद से न गयी। रात को ही उन्हें ज़ोर से बुखार हो गया। तीन दिन तक ज्वर में पड़े रहे। किसी दवा से फायदा न हुआ।
इस रुग्णावस्था में हरिदास को बार-बार भ्रम होता था कहीं यह मेरी तृष्णा का दंड तो नहीं है। जी में आता था, मगनसिंह को बीजक दे दूँ और क्षमा की याचना करूँ; पर भंडाफोड़ होने का भय मुँह बंद कर देता था। न जाने ईसा के अनुयायी अपने पादरियों के सम्मुख कैसे अपने जीवन भर के पापों की कथा सुनाया करते थे।

हरिदास की मृत्यु के पीछे यह बीजक उनके सुपुत्र प्रभुदास के हाथ लगा। बीजक मगनसिंह के पुरखों का लिखा हुआ है, इसमें लेशमात्र भी संदेह न था। लेकिन उन्होंने सोचा पिताजी ने कुछ सोच कर ही इस मार्ग पर पग रखा होगा। वे कितने नीतिपरायण, कितने सत्यवादी पुरुष थे। उनकी नीयत पर कभी किसी को संदेह नहीं हुआ। जब उन्होंने इस आचार को घृणित नहीं समझा तो मेरी क्या गिनती है। कहीं यह धन हाथ आ जाय तो कितने सुख से जीवन व्यतीत हो। शहर के रईसों को दिखा दूँ कि धन का सदुपयोग क्योंकर होना चाहिए। बड़े-बड़ों का सिर नीचा कर दूँ। कोई आँखें न मिला सके। इरादा पक्का हो गया।
शाम होते ही वे घर से बाहर निकले। वही समय था, वही चौकन्नी आँखें थीं और वही तेज कुदाली थी। ऐसा ज्ञात होता था मानो हरिदास की आत्मा इस नये भेष में अपना काम कर रही है।
चबूतरे का धरातल पहले ही खुद चुका था। अब संगीन तहखाना था, जोड़ों को हटाना कठिन था। पुराने जमाने का पक्का मसाला था; कुल्हाड़ी उचट-उचट कर लौट आती थी। कई दिनों में ऊपर की दरारें खुलीं, लेकिन चट्टानें ज़रा भी न हिलीं। तब वह लोहे की छड़ से काम लेने लगे, लेकिन कई दिनों तक जोर लगाने पर भी चट्टानें न खिसकीं। सब कुछ अपने ही हाथों करना था। किसी से सहायता न मिल सकती थी। यहाँ तक कि फिर वही अमावस्या की रात आयी ! प्रभुदास को जोर लगाते बारह बज गये और चट्टानें भाग्यरेखाओं की भाँति अटल थीं।
पर, आज इस समस्या को हल करना आवश्यक था। कहीं तहखाने पर किसी की निगाह पड़ जाय तो मेरे मन की लालसा मन ही में रह जाय।
वह चट्टान पर बैठ कर सोचने लगे क्या करूँ, बुद्धि कुछ काम नहीं करती। सहसा उन्हें एक युक्ति सूझी, क्यों न बारूद से काम लूँ ? इतने अधीर हो रहे थे कि कल पर इस काम को न छोड़ सके। सीधे बाजार की तरफ चले, दो मील का रास्ता हवा की तरह तय किया। पर वहाँ पहुँचे तो दूकानें बन्द हो चुकी थीं। आतिशबाज हीले करने लगा। बारूद इस समय नहीं मिल सकती। सरकारी हुक्म नहीं है। तुम कौन हो ? इस वक्त बारूद ले कर क्या करोगे ? न भैया; कोई वारदात हो जाय तो मुफ्त में बँधा-बँधा फिरूँ, तुम्हें कौन पूछेगा ?
प्रभुदास की शांति-वृत्ति कभी इतनी कठिन परीक्षा में न पड़ी थी। वे अंत तक अनुनय-विनय ही करते रहे, यहाँ तक कि मुद्राओं की सुरीली झंकार ने उसे वशीभूत कर लिया। प्रभुदास यहाँ से चले तो धरती पर पाँव न पड़ते थे।
रात के दो बजे थे। प्रभुदास मंदिर के पास पहुँचे। चट्टानों की दराजों में बारूद रख पलीता लगा दिया और दूर भागे। एक क्षण में बड़े जोर का धमाका हुआ। चट्टान उड़ गयी। अँधेरा गार सामने था, मानो कोई पिशाच उन्हें निगल जाने के लिए मुँह खोले हुए है।

प्रभात का समय था। प्रभुदास अपने कमरे में लेटे हुए थे। सामने लोहे के संदूक में दस हजार पुरानी मुहरें रखी हुई थीं। उनकी माता सिरहाने बैठी पंखा झल रही थीं। प्रभुदास ज्वर की ज्वाला से जल रहे थे। करवटें बदलते थे, कराहते थे, हाथ-पाँव पटकते थे; पर आँखें लोहे के संदूक की ओर लगी हुई थीं। इसी में उनके जीवन की आशाएँ बन्द थीं।
मगनसिंह अब पजावे का मुंशी था। इसी घर में रहता था। आ कर बोला पजावे चलिएगा ? गाड़ी तैयार कराऊँ ?
प्रभुदास ने उसके मुख की ओर क्षमा-याचना की दृष्टि से देखा और बोले नहीं, मैं आज न चलूँगा, तबीयत अच्छी नहीं है। तुम भी मत जाओ।
मगनसिंह उनकी दशा देख कर डाक्टर को बुलाने चला।
दस बजते-बजते प्रभुदास का मुख पीला पड़ गया। आँखें लाल हो गयीं। माता ने उसकी ओर देखा तो शोक से विह्वल हो गयीं। बाबू हरिदास की अंतिम दशा उनकी आँखों में फिर गयी। जान पड़ता था, यह उसी शोक घटना की पुनरावृत्ति है ! यह देवताओं की मनौतियाँ मना रही थीं, किंतु प्रभुदास की आँखें उसी लोहे के संदूक की ओर लगी हुई थीं, जिस पर उन्होंने अपनी आत्मा अर्पण कर दी थी।
उनकी स्त्री आ कर उनके पैताने बैठ गयी और बिलख-बिलख कर रोने लगी। प्रभुदास की आँखों से भी आँसू बह रहे थे, पर वे आँखें उसी लोहे के संदूक की ओर निराशापूर्ण भाव से देख रही थीं।
डाक्टर ने आ कर देखा, दवा दी और चला गया, पर दवा का असर उल्टा हुआ। प्रभुदास के हाथ-पाँव सर्द हो गये, मुख निस्तेज हो गया, हृदय की गति मंद पड़ गयी, पर आँखें सन्दूक की ओर से न हटीं।
मुहल्ले के लोग जमा हो गये। पिता और पुत्र के स्वभाव और चरित्र पर टिप्पणियाँ होने लगीं। दोनों शील और विनय के पुतले थे। किसी को भूल कर भी कड़ी बात न कही। प्रभुदास का सम्पूर्ण शरीर ठंडा हो गया था। प्राण था तो केवल आँखों में। वे अब भी उसी लोहे के सन्दूक की ओर सतृष्ण भाव से देख रही थीं।
घर में कोहराम मचा हुआ था। दोनों महिलाएँ पछाड़ें खा-खा कर गिरती थीं। मुहल्ले की स्त्रियाँ उन्हें समझाती थीं। अन्य मित्रगण आँखों पर रूमाल जमाये हुए थे। जवानी की मौत संसार का सबसे करुण, सबसे अस्वाभाविक और भयंकर दृश्य है। यह वज्राघात है, विधाता की निर्दय लीला है। प्रभुदास का सारा शरीर प्राणहीन हो गया था, पर आँखें जीवित थीं। वे अब भी उसी संदूक की ओर लगी हुई थीं। जीवन ने तृष्णा का रूप धारण कर लिया था। साँस निकलती है, पर आस नहीं निकलती।
इतने में मगनसिंह आ कर खड़ा हो गया। प्रभुदास की निगाह उस पर पड़ी। ऐसा जान पड़ा मानो उनके शरीर में फिर रक्त का संचार हुआ। अंगों में स्फूर्ति के चिह्न दिखायी दिये। इशारे से अपने मुँह के निकट बुलाया, उसके कान में कुछ कहा, एक बार लोहे के सन्दूक की ओर इशारा किया और आँखें उलट गयीं, प्राण निकल गये।

Tuesday, January 3, 2023

निबंध। बात। प्रतापनारायण मिश्र | Nibandh | Baat | Pratap Narayan Mishra


निबंध- बात
 
यदि हम वैद्य होते तो कफ और पित्त के सहवतीं बात की व्याख्या करने तथा भूगोलवेत्ता होते तो किसी देश के जल बाल का वर्णन करते किंतु इन दोनों विषयों में हमें एक बात कहने का भी प्रयोजन नहीं है। इससे केवल उसी बात के ऊपर दो चार बात लिखते हैं जो हमारे सम्भाषण के समय मुख से निकल निकल के परस्पर हृदयस्थ भाव प्रकाशित करती रहती है। सच पूछिए तो इस बात की भी क्या बात है जिसके प्रभाव से मानव जाति समस्त जीवधारियों की शिरोमणि (अशरफुल मखलूकात) कहलाती है। शुकसारिकादि पक्षी केवल थोड़ी सी समझने योग्य बातें उच्चरित कर सकते हैं इसी से अन्य नभचारियों की अपेक्षा आदित समझे जाते हैं। फिर कौन न मान लेगा कि बात की बड़ी बात है। हाँ, बात की बात इतनी बड़ी है कि परमात्मा को सब लोग निराकार कहते हैं तो भी इसका संबंध उसके साथ लगाए रहते हैं। वेद ईश्वर का बचन है. कुरआनशरीफ कलामुल्लाह है, होली बाइबिल वर्ड आफ गाड है यह बचन कलाम और वर्ड बात ही के पर्याय है सो प्रत्यक्ष में मुख के बिना स्थिति नहीं। कर सकती पर बात की महिमा के अनुरोध से सभी धर्मावलंबियों ने 'बिन बानी वक्त बड़ योगी' वाली बात मान रक्खी है। यदि कोई न माने तो लाखों बाते बना के मनाने पर कटिबद्ध रहते हैं।


यहाँ तक कि प्रेम सिद्धांती लोग निरवयव नाम से मुँह बिचकायेंगे। 'अपाणिपादो जवनो गृहीता इत्यादि पर हठ करने वाले को यह कहके बात में उड़ावेंगे कि हम लँगड़े लूले ईश्वर को नहीं मान सकते हमारा प्यारा तो कोटि काम सुंदर श्याम वरण विशिष्ट है।" निराकार शब्द का अर्थ श्री शालिग्राम शिला है जो उसकी स्यामता को द्योतन करती है अथवा योगाभ्यास का आरंभ करने वाले को आँखें गूंदने पर जो कुछ पहिले दिखाई देता है वह निराकार अर्थात् बिलकुल काला रंग है सिद्धांत यह कि रंग रूप रहित को सब रंग रजित एवं अनेक रूप सहित ठहरावेगे किंतु कानों अथवा प्रानों वा दोनों को प्रेम रस से सिंचित करने वाली उसकी मधुर मनोहर बातों के मजे से अपने को बंचित न रहने देंगे।


जब परमेश्वर तक बात का प्रभाव पहुँचा हुआ है तो हमारी कौन बात रही? हम लोगों के तो "गात माहि बात करामात है। नाना शास्त्र, पुराण, इतिहास, काव्य, कोश इत्यादि सब बात ही के फैलाव हैं जिनके मध्य एक एक ऐसी पाई जाती है जो मन, बुद्धि, चित्त को अपूर्व दशा में ले जाने वाली अथच लोक परलोक में सब बात बनाने वाली है। यद्यपि बात का कोई रूप नहीं बतला सकता कि कैसी है पर बुद्धि दौड़ाइए तो ईश्वर की भाँति इसके भी अगणित ही रूप पाइएगा।


बड़ी बात, छोटी बात, सीधी बात, टेढी बात, खरी बात खोटी बात, मीठी बात, कड़वी बात, भली बात बुरी बात, सुहाती बात, लगती बात इत्यादि सब बात ही तो है? बात के काम भी इसी भाँति अनेक देखने में आते हैं। प्रीति बैर, सुख दुःख श्रद्धा घृणा उत्साह अनुत्साहादि जितनी उत्तमता और सहजतया बात के द्वारा विदित हो सकते हैं दूसरी रीति से वैसी सुविधा ही नहीं घर बैठे लाखों कोस का समाचार मुख और लेखनी से निर्गत बात ही बतला सकती है। डाकखाने अथवा तारघर के सारे से बात की बात में चाहे जहाँ की जो बात हो जान सकते हैं। इसके अतिरिक्त बात बनती है, बात बिगड़ती है, बात आ पड़ती है, बात जाती रहती है, बात उखड़ती है।


हमारे तुम्हारे भी सभी काम बात पर निर्भर करते हैं 'बातहि हाथी पाइए. बातहि हाथी पाँव बात ही से पराए अपने और अपने पनाए हो जाते हैं। मक्खीचूस उदार तथा उदार स्वल्पव्ययी, कापुरुष युद्धोत्साही एवं युद्धप्रिय शांतिशील कुमार्गी सुपथगामी अधच सुपची कुराही इत्यादि बन जाते हैं। बात का तत्व समझना हर एक का काम नहीं है और दूसरों की समझ पर आधिपत्य जमाने योग्य बात बढ़ सकता भी ऐसों वैसों का साध्य नहीं है। बड़े-बड़े विज्ञवरों तथा महा-महा कवीश्वरों के जीवन बात ही के समझने समझाने में व्यतीत हो जाते हैं। सहृदयगण की बात के आनंद के आगे सारे संसार तुच्छ जँचता है। बालाकों की तोतली बातें सुंदरियों की मीठी-मीठी, प्यारी-प्यारी बातें सत्कवियों की रसीली बातें सुवक्ताओं की प्रभावशाली बातें जिसके जी को और का और न कर दें उसे पशु नहीं पाषाण खंड कहना चाहिए। क्योंकि कुत्ते, बिल्ली आदि को विशेष समझ नहीं होती तो भी पुचकार के तूतू' पूसी सी इत्यादि बातें क दी तो भावार्थ समझ के यथा सामर्थ्य स्नेह प्रदर्शन करने लगते है। फिर वह मनुष्य कैसा जिसके वित्त पर दूसरे हृदयवान की बात का असर न हो।


बात वह आदणीय है कि भलेमानस बात और बाप को एक समझते हैं। हाथी के दाँत की भाँति उनके मुख से एक बार कोई बात निकल आने पर फिर कदापि नहीं पलट सकती हमारे परम पूजनीय आर्यगण अपनी बात का इतना पक्ष करते थे कि तिन तिय तनय धाम धन धरनी सत्यसंध कहँ तून सम दरनी' अथच 'प्रानन ते सुत अधिक है सुत ते अधिक परान ते दूनो दसरथ बजे वचन न दीन्हों जान।" इत्यादि उनकी अक्षरसंवद्धा कीर्ति सदा संसार पट्टिका पर सोने के अक्षरों से लिखी रहेगी पर आजकल के बहुतेरे भारत कुपुत्रों ने यह ढंग पकड़ रक्खा है कि 'मर्द की जबान (बात का उदय स्थान) और गाड़ी का पहिया चलता ही फिरता रहता है।'


आज और बात है कल ही स्वार्थचिता के देश हुजूरों की मरजी के मुवाफिक दूसरी बातें हो जाने में तनिक भी विलंब की संभावना नहीं है। यद्यपि कभी-कभी अवसर पड़ने पर बात के अंश का कुछ रंग ढंग परिवर्तित कर लेना नीति विरुद्ध नहीं है, पर कब? जात्योपकार देशोद्धार प्रेम प्रचार आदि के समय, न कि पापी पेट के लिए एक हम लोग हैं जिन्हें आर्यकुलरत्नों के अनुगमन की सामर्थ्य नहीं है। किंतु हिंदुस्तानियों के नाम पर कलंक लगाने वालों के भी सहमार्गी बनने में घिन लगती है।


इससे यह रीति अंगीकार कर रखी है कि चाहे कोई बड़ा बतकहा अर्थात् बातूनी कहँ चाहँ यह समझे कि बात कहने का भी शउर नहीं है किंतु अपनी गति अनुसार ऐसी बातें बनाते रहना चाहिए जिनमें कोई न कोई, किसी न किसी के वास्तविक हित की बात निकलती रहे पर खेद है कि हमारी बातें सुनने वाले उँगलियों ही पर गिनने भर को है। इससे बात बात में बात" निकालने का उत्साह नहीं होता। अपने जी को क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बनें' इत्यादि विदग्धालापों की लेखनी से निकली हुई बातें सुना के कुछ फुसला लेते हैं और बिन बात की बात को बात का बतंगड़ समझ के बहुत बात बढ़ाने से हाथ समेट लेना ही समझते हैं कि अच्छी बात है।


Saturday, December 10, 2022

कहानी | गौरी | सुभद्राकुमारी चौहान | Kahani | Gauri | Subhadra Kumari Chauhan


 
शाम को गोधूलि की बेला, कुली के सिर पर सामान रखवाये जब बाबू राधाकृष्ण अपने घर आये, तब उनके भारी-भारी पैरों की चाल, और चेहरे के भाव से ही कुंती ने जान लिया कि काम वहाँ भी नहीं बना। कुली के सिर पर से बिस्तर उतरवाकर बाबू राधाकृष्ण ने उसे कुछ पैसे दिए। कुली सलाम करके चला गया और वह पास ही पड़ी, एक आराम कुर्सी पर जिसके स्प्रिंग खुलकर कुछ ढीले होने के कारण इधर-उधर फैल गए थे, गिर से पड़े। उनके इस प्रकार बैठने से कुछ स्प्रिंग आपस में टकराए, जिससे एक प्रकार की झन-झन की आवाज़ हुई। पास ही बैठे कुत्ते ने कान उठाकर इधर-उधर देखा फिर भौं-भौं करके भौंक उठा। इसी समय उनकी पत्नी कुंती ने कमरे में प्रवेश किया। काम की सफलता या असफलता के बारे में कुछ भी न पूछकर कुंती ने नम्र स्वर में कहा, "चलो हाथ-मुंह धो लो, चाय तैयार है।

'चाय', राधाकृष्ण चौंक से पड़े, "चाय के लिए मैंने नहीं कहा था।"

"नहीं कहा था तो क्या हुआ, पी लो।" कुंती ने आग्रहपूर्वक कहा।

"अच्छा चलो", कहकर राधाकृष्ण कुंती के पीछे-पीछे चले गए।

गौरी, अपराधिनी की भाँति, माता-पिता दोनों की दृष्टि से बचती हुई, पिता के लिए चाय तैयार कर रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि पिता की सारी कठिनाइयों की जड़ वही है। न वह होती और न पिता को उसके विवाह की चिन्ता में, इस प्रकार स्थान-स्थान घूमना पड़ता। वह मुँह खोलकर किस प्रकार कह दे कि उसके विवाह के लिए इतनी अधिक परेशानी उठाने की आवश्यकता नहीं। माता-पिता चाहे जिसके साथ उसकी शादी कर दें, वह सुखी रहेगी। न करें तो भी वह सुखी है। जब विवाह के लिए उसे जरा भी चिन्ता नहीं, तब माता-पिता इतने परेशान क्यों रहते हैं–गौरी यही न समझ पाती थी। कभी-कभी वह सोचती–क्या मैं माता-पिता को इतनी भारी हो गयी हूँ? रात-दिन सिवा विवाह के उन्हें और कुछ सूझता नहीं। तब आत्मग्लानि और क्षोभ से गौरी का रोम-रोम व्यथित हो उठता। उसे ऐसा लगता कि धरती फटे और वह समा जाय, किन्तु ऐसा कभी न हुआ।

गौरी, वह जो पूनो के चाँद की तरह बढ़ना भर जानती थी, घटने का जिसके पास कोई साधन न था, बाबू राधाकृष्ण के लिए चिंता की सामग्री हो गई थी। गौरी उनकी एकमात्र संतान थी। उसका विवाह वे योग्य वर के साथ करना चाहते थे, यही सबसे बड़ी कठिनाई थी। योग्य पात्र का मूल्य चुकाने लायक उनके पास यथेष्ट संपत्ति न थी। यही कारण था कि गौरी का यह उन्नीसवाँ साल चल रहा था। फिर भी वे कन्या के हाथ पीले न कर सके थे। गौरी ही उनकी अकेली संतान थी । छुटपन से ही उसका बड़ा लाड़-प्यार हुआ था । प्राय: उसके उचित-अनुचित सारे हठ पूरे हुआ करते थे । इसी कारण गौरी का स्वभाव निर्भीक, दृढ़-निश्चयी और हठीला था । वह एक बार जिस बात को सोच-समझकर कह दे, फिर उस बात से उसे कोई हटा नहीं सकता था । पिता की परेशानियों को देखते हुए अनेक बार उसके जी में आया कि यह पिता से साफ-साफ पूछे कि आखिर वे उसके विवाह के लिए इतने चिंतित क्यों हैं ? वह स्वयं तो विवाह को इतना आवश्यक नहीं समझती । और अगर पिता विवाह को इतना अधिक महत्त्व देते हैं, तो फिर पात्र और कुपात्र क्या ? विवाह करना है कर दें, किसी के भी साथ, वह हर हालत में सुखी और संतुष्ट रहेगी । उनकी यह परेशानी, इतनी चिंता अब उससे सही नहीं जाती । किंतु संकोच और लज्जा उसकी जबान पर ताला-सा डाल देते । हजार बार निश्चय करके भी वह पिता से यह बात न कह सकी ।

पिता को आते देख, गौरी चुपके से दूसरे कमरे में चली गई । राधाकृष्ण बाबू ने जैसे बेमन से हाथ-मुँह धोया और पास ही रखी एक कुरसी पर बैठ गए । वहीं एक मेज पर कुन्ती ने चाय और कुछ नमकीन पूरियाँ पति के सामने रख दीं । पूरियों की तरफ राधाकृष्ण ने देखा भी नहीं । चाय का प्याला उठाकर पीने लगे ।

ऐसी कन्या को जन्म देकर, जिसके लिए वर ही न मिलता हो, कुन्ती स्वयं ही जैसे अपराधिन हो रही थी । कुन्ती ने डरते-डरते पूछा, जहाँ गए थे क्या वहाँ भी कुछ ठीक नहीं हुआ ?

-ठीक ! ठीक होने को वहाँ धरा ही क्या है, चाय का घूँट गले से नीचे उतारते हुए बाबू राधाकृष्ण ने कहा, सब हमीं लोगों पर है । विवाह करना चाहें तो सब ठीक है, न करना चाहें तो कुछ भी ठीक नहीं है।

कुन्ती ने उत्सुकता से पूछा, फिर क्या बात है, लड़के को देखा?

-हाँ देखा, अच्छी तरह देखा हूँ ! कह राधाकृष्ण फिर चाय पीने लगे । कुन्ती की समझ में यह पहेली न आई, उसने कहा, 'जरा समझाकर कहो । तुम्हारी बात तो समझ में ही नहीं आती ।'

राधाकृष्ण ने कहा, "समझाकर कहता हूँ, सुनो। वह लड़का, लड़का नहीं आदमी है। तुम्हारी गौरी के साथ मामूली चपरासी की तरह दिखेगा। बोलो करोगी ब्याह?''

कुंती बोली, ''विवाह की बात तो पीछे होगी। क्या रूप-रंग बहुत खराब है ? फोटो में तो वैसा नहीं जान पड़ता।"

राधाकृष्ण ने कहा, "रूप-रंग नहीं, रहन-सहन बहुत खराब है । उम्र भी अधिक है, पैंतीस-छस्तीस साल । साथ ही दो बच्चे भी । उन्हीं बच्चों को सँभालने के लिए तो वह विवाह करना चाहते हैं, वरना वे शायद कभी न करते। उनकी यह दूसरी शादी होगी। उनकी उमंगें , उत्साह सब कुछ ठंडा पड़ चुका है। वे अपने बच्चों के लिए एक धाय चाहते हैं", मेरी लड़की की तो दूसरी शादी नहीं है। वे साफ़-साफ़ कहते हैं कि मैं बच्चों के लिए शादी कर रहा हूँ।"

कुंती ने कहा, है 'जिन्हें दूसरी शादी करनी होती है वे ऐसे ही कहते हैं।"

राधाकृष्ण बोले, "अरे नहीं-नहीं यह आदमी कपटी नहीं है। उसके भीतर कुछ और बाहर कुछ नहीं हो सकता। उसका हदय तो दर्पण की तरह साफ़ है। उसका खादी कुरता, गांधी टोपी, फटे-फटे चप्पल देखकर जी हिचकता है। वह नेता बनकर व्याख्यान तो दे सकता है, पर दूल्हा बनकर आने लायक नहीं है। तीस रुपए कुल उनकी तनख्वाह है। कांग्रेस के दफ्तर में वे सेक्रेटरी हैं। तीन बार जेल जा चुके हैं, फिर कब चले जाएँ कुछ पता नहीं।'

कुंती बोली, "आदमी तो बुरा नहीं जान पड़ता।'

राधाकृष्ण ने कहा, "बुरा आदमी तो मैं भी नहीं कहता उसे, पर वह गौरी का पति होने लायक नहीं । सच बात यह है।"

कुंती बोली, "फिर तुमने क्या कह दिया?"

राधाकृष्ण ने कहा, "क्या कह देता? उन्हें बुला आया हूँ। अगले इतवार को आवेंगे। आने के लिए भी वे बडी मुश्किल सै तैयार हुए: कहने लगे, नहीं साहब ! मैं लड़की देखने न जाऊँगा। इस तरह लड़की देखकर मुझसे किसी लड़की का अपमान नहीं किया जाता। जब मैंने समझाकर कहा कि आप लड़की देखेंगे लड़की और उसकी माँ आपको देखेंगी, तब जाकर कहीं बड़ी मुश्किल से राजी हुए ।"

गौरी दरवाजे की आड़ में खड़ी सब बातें सुन रही थी है जिस व्यक्ति के प्रति उनके पिता इतने असंतुष्ट और उदासीन थे, उसके प्रति गौरी के हदय में अनजाने ही कुछ श्रद्धा के भाव जाग्रत हो गए । राधाकृष्ण बाबू पान का बीड़ा उठाकर अपनी बैठक में चले गए । और उसी रात फिर उन्होंने अपने कुछ मित्रों और रिश्तेदारों को गौरी के लिए योग्य वर तलाशने को कई पत्र लिखे ।

अगला इतवार आया । आज ही बाबू सीताराम जी, गौरी को देखने या अपने आपको दिखलाने आवेंगे । राधाकृष्ण जी ने यह पहले से ही कह दिया है कि किसी बाहर वाले को कुछ न मालूम पड़े कि कोई गौरी को देखने आया है । अतएव यह बात कुछ गुप्त रखी गई है । घर के भीतर आँगन में ही उनके बैठने का प्रबंध किया गया है । तीन-चार कुर्सियों के बीच एक मेज है, जिस पर एक साफ धुला हुआ खादी का कपड़ा बिछा दिया गया है । और एक गिलास में आंगन के ही गुलाब के कुछ फूलों को तोड़कर, गुलदस्ते का स्वरूप दिया गया है । बहुत ही साधारण-सा आयोजन है । सीताराम जी सरीखे व्यक्ति के लिए किसी विशेष आडंबर की आवश्यकता भी तो न थी ।

यथासमय बाबू सीताराम जी अपने दोनों बच्चों के साथ आए । बच्चे भी वही खादी के कुरते और हाफपैंट पहने थे । न जूता न मोजा, न किसी प्रकार का ठाटबाट । पर दोनों बड़े प्रसन्न, हँसमुख; आकर घर में वे इस प्रकार खेलने लगे जैसे इस घर से चिरपरिचित हों । कुंती एक तरफ बैठी थी । बच्चों के कोलाहल से परिपूर्ण घर उसे क्षण भर के लिए नंदनकानन-सा जान पड़ा । उसने मन-ही-मन सोचा, कितने अच्छे बच्चे हैं । यदि बिना किसी प्रकार का संबंध हुए भी, सीताराम इन बच्चों के संभालने का भार उसे सौंप दें, तो वह खुशी-खुशी ले ले । वह बच्चों के खेल में इतनी तन्मय हो गई कि क्षण भर के लिए भूल बैठी कि सीताराम भी बैठे हैं, और उनसे भी कुछ बातचीत करनी है । इसी समय अचानक छोटे बच्चे को जैसे कुछ याद आ गया हो, दौड़कर पिता के पास आया । उनके पैरों के बीच में खड़ा होकर बोला, बाबू, तुम तो कैते थे न कि माँ को दिखाने ले चलते हैं । माँ कआँ है, बतलाओ?

बाबू ने किंचित् हँसकर कहा, ये माँ जी बैठी हैं, इनसे कहो, यही तुम्हें दिखाएँगी ।

बालक ने मचलकर कहा, 'ऊँ हूँ तुम दिकाओ ।' और इसी समय एक बड़ी-सी सफेद बिल्ली आँगन से होती हुई भीतर को भाग गई । बच्चे बिल्ली के पीछे सब कुछ भूलकर, दौड़ते हुए अंदर पहुंच गए । गौरी पिछले दरवाजे पर चुपचाप खड़ी थी । वह न जाने किस खयाल में थी । छोटे बच्चे ने उसका आँचल पकड़कर खींचते हुए पूछा, तुम अमारी मां हो ?

गौरी ने देखा हृष्ट-पुष्ट सुंदर-सा बालक, कितना भोला, कितना निश्चल । उसने बालक को गोद में उठाकर कहा, हां ।

बच्चे ने फिर उसी स्वर में पूछा, अमारे घर चलोगी न ? बाबू तो तुम्हें लेने आए हैं औल हम भी आए हैं।

अब तो गौरी उसकी बातों का उत्तर न दे सकी । पूछा, मिठाई खाओगे ?

कुछ क्षण बाद कुंती ने अंदर देखा, छोटा बच्चा गौरी की गोद में और बड़ा उसी के पास बैठा मिठाई खा रहा है । एक नि:श्वास के साथ कुंती बाहर चली गई और थोड़ी देर बाद ज्योंही गौरी ने ऊपर आँख उठाई, उसने माता-पिता दोनों को सामने खड़ा पाया । पिता ने स्नेह से पुत्री से कहा, बेटा जरा चलो, चलती हो न ?

गौरी ने कोई उत्तर न दिया । उसने बच्चों का हाथ-मुँह धुलाया, उन्हें पानी पिलाया, फिर मां के पीछे-पीछे बाहर चली गई । बच्चे अब भी उसी को घेरे हुए थे । वे उसे छोड़ना नहीं चाहते थे । बही मुश्किल से सीताराम जी उन्हें बुलाकर कुछ देर तक अपने पास बिठा सके, किंतु जरा-सा मौका पाते ही वे फिर जाकर गौरी के आसपास बैठ गए । पिता के विरुद्ध उन्हें कुछ नालिशें भी दायर करनी थीं, जो पिता के पास बैठकर न कर सकते थे।

छोटे ने कहा, बाबू हमें कबी खिलौने नहीं ले देते।

बड़े ने कहा, मिठाई भी तो कभी नहीं खिलाते ।

छोटा बोला, और अमें छोड़कर दफ्तर जाते हैं, दिन भर नई आते, बाबू अच्छे नई हैं ।

बड़ा बोला, मां तुम चलो, नहीं तो हम भी यहीं रहेंगे ।

बच्चों की बातों से सभी को हंसी आ रही थी । कुन्ती ने बच्चों से कहा, तो तुम दोनों भाई यहीं रह जायो, बाबू को जाने दो, है न ठीक?

काफी देर हो गई यह देखकर सीताराम जी ने कहा, समय बहुत हो चुका है, अब चलूँगा, नहीं तो शाम की ट्रेन न मिल सकेगी । फिर राधाकृष्ण की तरफ देखकर कहा, आप लोगों से मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई । लड़की तो आपकी साक्षात् लक्षमी है । और यह मैं जानता था कि आपकी लड़की ऐसी ही होगी, इसीलिए देखने को आना नहीं चाहता था । फिर कुछ ठहरकर बोले, और सच बात तो यह है कि मुझे पत्नी की उतनी जरूरत नहीं, जितनी इन बच्चों को जरुरत है एक मां की । मेरा क्या ठिकाना ? आज बाहर हूँ कल जेल में । मेरे बाद इनकी देख-रेख करने बाला कोई नहीं रहता । यही सोच-समझकर विवाह करने को तैयार हो सका हूँ, अन्यथा इस उमर में विवाह? कहकर वे स्वयं हँस पड़े ।

राधाकृष्ण ने मन-ही-मन सोचा, तो मेरी लड़की इनके बच्चों की धाय बनकर जाएगी । कुंती ने सोचा, कोई भी स्त्री ऐसे बच्चों का लालन-पालन कर अपना जीवन सार्थक बना सकती है! गौरी ने मन-ही-मन इस महापुरुष के चरणों में प्रणाम किया और बच्चों की और ममता-भरी दृष्टि से देखा । जैसे यह दृष्टि कह रही थी कि किसी विलासी युवक की पत्नी बनने से अधिक मैं इन भोले-भाले बच्चों की मां बनना पसंद करूँगी । सीताराम जी को जाने के लिए प्रस्तुत देख, बच्चे फिर गौरी से लिपट गए । झूठ ही सही, यदि राधाकृष्ण एक बार भी कहते कि बच्चों को छोड़ जाओ तो सीताराम बच्चों को छोड़कर निश्चिंत होकर चले जाते । परंतु इस ओर से जब ऐसी कोई बात न हुई तो बच्चों को सिनेमा, सरकस और मिठाई का प्रलोभन देकर बड़ी कठिनाई से गौरी से अलग करके वे ले जा सके । जाते समय सीताराम जी को पक्का विश्वास था कि विवाह होगा, केवल तारीख निश्चित करने भर की देर है ।

सीताराम जी उस पत्र की प्रतीक्षा में थे जिसमें विवाह की निश्चित तारीख लिखकर आने वाली थी । देश की परिस्थिति, गवर्नमेंट का रुख, और महात्माजी के वक्तव्यों को पढ़कर, वे जानते थे कि निकट भविष्य में फिर सत्याग्रह-संग्राम छिड़ने बाला है । न जाने किस दिन उन्हें फिर जेल का मेहमान बनना पड़े । पिछली बार जब गए थे तब उनकी बूढ़ी बुआ थीं, पर अब तो वे भी नहीं रहीं । यह कहारिन क्या बच्चों की देखभाल कर सकेंगी । बच्चों की उन्हें बड़ी चिंता थी । और बच्चे भी सदा ही मां-मां की रट लगाए रहते थे । उन्होंने फिर एक पत्र बाबू राधाकृष्ण को शीघ्र ही तारीख निश्चित काने के लिए लिख भेजा । उधर राधाकृष्ण जी दूसरी ही बात तय कर रहे थे । उन्होंने सीताराम के पत्र के उत्तर में लिख भेजा कि गौरी की मां पुराने खयाल की है । वे बिना जन्मपत्री मिलवाए विवाह नहीं करना चाहतीं । अतएव आप अपनी जन्मपत्री भेज दें । पत्र पढ़ने के साथ ही सीताराम को यह समझने में देर न लगी कि यह विवाह न करने का केवल बहाना मात्र है, किन्तु फिर भी उन्होंने जन्मपत्री भेज दी । जन्मपत्री भेजने के कुछ ही दिन बाद उत्तर भी आ गया कि जन्मपत्री नहीं मिलती, इसलिए विवाह न हो सकेगा, क्षमा कीजिएगा ।

बाबू राधाकृष्ण को गौरी के लिए दूसरा वर मिल गया था, जो उनकी समझ में गौरी " के बहुत योग्य था । धनवान ये भी अधिक न थे । पर अभी-अभी नायब तहसीलदार के पद पर नियुक्त हुए थे, आगे और भी उन्नति की आशा थी । बी०ए० पास थे । देखने में अधिक सुंदर न थे । बदशक्ल भी कहे जा सकते थे, पर पुरुषों की भी कहीं सुंदरता देखी जाती है ? उमर कुछ अधिक न थी, यही 24-25 साल । लेने-देने का झगड़ा यहाँ भी न था । पहली शादी थी और माँ-बाप, भाई-बहन से भरा-पूरा परिवार था । राधाकृष्ण जी इससे अधिक और चाहते ही क्या थे । ईश्वर को उन्होंने कोटिश: धन्यवाद दिए, जिसकी कृपा से ऐसा अच्छा वर उन्हें गौरी के लिए मिल गया ।

विवाह आगामी आषाढ़ में होना निश्चित दुआ । दोनों तरफ से विवाह की तैयारी हो रही थी । राधाकृष्ण जी की यही तो एक लड़की थी । वे बड़ी तन्मयता के साथ गहने-कपड़ों का चुनाव करते थे । सोचते थे, देर से शादी हुई तो क्या हुआ वर भी तो क्तिना अच्छा ढूँढ़ निकाला है । कुन्ती भी बहुत खुश थी । उसकी आँखों में यह दृश्य झूलने लगता था कि उसका दामाद छोटा साहब हो गया है, बेटी-दामाद छोटे-छोटे बच्चों के साथ उससे मिलने आए हैं । किंतु बच्चों की बात सोचते ही उसे सीताराम जी के दोनों बच्चे तुरंत याद आ जाते और याद आ जाती उनकी बात । बच्चों की देख-रेख करने वाला कोई नहीं है । फिर वह सोचती, ऊंह, दुनिया में और भी तो लड़कियाँ हैं । कर लें शादी, क्या मेरी गौरी ही है । इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ही प्रसन्न थे, पर गौरी से कौन पूछता कि उसके हृदय में कैसी हलचल मची रहती है । रह-रहकर उसे उन बच्चों का भोला-भाला मुंह और मीठी-मीठी बातें याद आ जातीं । साथ ही याद आ जाते विनयी, नम्र और सादगी की प्रतिमा सीताराम जी । उनकी याद आते ही श्रद्धा से गौरी का माथा अपने आप ही झुक जाता । देशभक्त त्यागी वीरों के लिए उसके हदय में बड़ा सम्मान था । सीताराम जी ने भी तो देश के लिए अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया है, नहीं तो बी०ए० पास करने के बाद क्या प्रयत्न करने पर उन्हें नायब तहसीलदार की नौकरी न मिल जाती ? मिलती क्यों नहीं ? पर सीताराम जी सरकार की गुलामी पसंद करते तब न ?

दूसरी और थे उसके होनेवाले वर-नायब तहसीलदार साहब, जिन्हें अपने आराम, अपने ऐश के लिए ब्रिटिश गवर्नमेंट के जरा से इंगित मात्र से निरीह देशवासियों के गले पर छुरी फेरने में जरा भी संकोच या हिचक नहीं । जिनके सामने कुछ चाँदी के दुकड़े दिए जाते हैं और ये दुम हिलाते हुए, निंद्य-से-निंद्य कर्म करने में भी किंचित् लज्जित नहीं होते । घृणा से गौरी का जी भर जाता, किन्तु उसके इन मनोभावों को जानने वाला यहाँ कोई भी न था । वह रात-दिन एक प्रकार की अव्यक्त पीड़ा से विकल-सी रहती । बहुत चाहती थी कि अपनी मां से कह दे कि वह नायब तहसीलदार से शादी न करेगी, किंतु लज्जा उसे कुछ भी न कहने देती । ज्यों-ज्यों विवाह की तिथि नजदीक आती, गौरी की चिंता बढ़ती ही जाती थी ।

विवाह की निश्चित तारीख से पंद्रह दिन पहले एकाएक तार आया कि नायब तहसीलदार के पिता का देहांत हो गया । इस मृत्यु के कारण विवाह साल भर को टल गया । गौरी के माता-पिता बड़े दुखी हुए, किंतु गौरी के सिर पर से जैसे चिंता का पहाड़ हट गया ।

इसी बीच सत्याग्रह आंदोलन की लहर सारे देश में बड़ी तीव्र गति से फैल गई । शहर-शहर में गिरफ्तारियों का तांता लग गया । रोज ही न जाने कितने गिरफ्तार होते, कितनों को सजा होती । कहीं लाठी चार्ज !- कहीं 144 ! सरकार की दमन की चक्की बड़े भयंकर रूप से चल रही थी । गौरी को चिंता थी उन बच्चों की । जब से सत्याग्रह-संग्राम छिड़ा था, तभी से उसे फिकर थी कि न जाने कब सीताराम जी गिरफ्तार हो जाएँ । और फिर वे बच्चे बेचारे-उन्हें कौन देखेगा । रोज का अखबार ध्यान से पढ़ती, कानपुर का समाचार तो और भी ध्यान से देखती थी । इसी प्रकार उसने एक दिन पढ़ा कि राजद्रोह के अपराध में सीताराम जी गिरफ्तार हो गए । और उन्हें एक साल का सपरिश्रम कारावास हुआ है । इस समाचार को पढ़कर गौरी कुछ क्षण तक स्तब्ध-सी खड़ी रही, फिर कुछ सोचती हुई टहलने लगी । कुछ ही देर बाद उसने अपना कर्तव्य निश्चित कर लिया । वह मां के पास गई, मां कोई पुस्तक देख रही थी । उसने अपने सारे साहस को समेटकर दृढ़ता से कहा, 'मां, मैं कानपुर जाऊँगी ।'

'कानपुर में क्या है ?' आश्चर्य से कुंती ने पूछा ।

गौरी ने कहा, 'वहां बच्चे हैं ।'

मां ने उसी स्वर में कहा, 'बच्चे ? कैसी बात करती हो गौरी, पागलों-सी ?'

गौरी बोली, 'नहीं माँ, मैं पागल नहीं हूँ । बच्चों को तुम भी जानती हो । उनके पिता को राजद्रोह के मामले में साल भर की सजा हो गई । बच्चे छोटे हैं । मैं जाऊँगी माँ । मुझे जाना ही पड़ेगा ।'

गौरी के स्वभाव से कुन्ती भली-भांति परिचित थी । वह जानती थी कि गौरी जिस बात की हठ पकड़ती है, कभी छोड़ती नहीं है अतएव सहसा वह गौरी का विरोध न कर सकी, बोली, पर तेरे बाबू जी तो बाहर गए हैं, उन्हें तो आ जाने दे ।

गौरी ने दृढ़ता के साथ कहा, बाबूजी के आने तक नहीं ठहर सकूंगी मां। मुझे जाने दो । रास्ते में मुझे कुछ कष्ट न होगा । अब मैं काफी बड़ी हो गई हूँ ।

और उसी दिन शाम को एक नौकर के साथ गौरी कानपुर चली गई ।

अपनी सजा पूरी करके सीताराम घर लौटे । इस साल भर के भीतर उन्होंने बच्चों को एक बार भी न देखा था । उन्हें कायदे के अनुसार हर महीने उनका कुशल-समाचार मिल जाता था, पर बच्चों की चिंता उन्हें लगातार बनी ही रहती थी । जिस कहारिन के भरोसे वे बच्चों को छोड़ गए थे, उसके भी तीन-चार बच्चे थे । वह बच्चों को कैसे रखेगी, सो सीताराम जी जानते थे; पर विवशता थी क्या करते । सबेरे-सबेरे छै बजे ही जेल से मुक्त कर दिए गए । एक ताँगे पर बैठकर वे घर की ओर चले । जेब में कुछ पैसे थे । एक जगह गरम-गरम जलेबियां बन रही थीं । बच्चों के लिए थोड़ी-सी खरीद लीं । घर के दरवाजे पर पहुंचे । दरवाजा खुला था । घर के अंदर पैर रखने में हृदय धड़कता था । न जाने किस हालत में हों । वे चोरों की तरह चुपके-चुपके घर में घुसे । परंतु यह क्या ? आँगन में पहुंचते ही वे ठगे-से खड़े रह गए । फिर जरा आगे बढ़कर उन्होंने कहा, आप ?

गौरी ने झुककर उनकी पद-धूलि माथे से लगा ली ।


Friday, November 18, 2022

कहानी। दो वृद्ध पुरूष। लियो टॉल्सटॉय | Kahani | Do Vradh Purush | Leo Tolstoy


 1

एक गांव में अर्जुन और मोहन नाम के दो किसान रहते थे। अर्जुन धनी था, मोहन साधारण पुरुष था। उन्होंने चिरकाल से बद्रीनाथ की यात्रा का इरादा कर रखा था।

अर्जुन बड़ा सुशील, सहासी और दृढ़़ था। दो बार गांव का चौधरी रहकर उसने बड़ा अच्छा काम किया था। उसके दो लड़के तथा एक पोता था। उसकी साठ वर्ष की अवस्था थी, परन्तु दा़ड़ी अभी तक नहीं पकी थी।

मोहन प्रसन्न बदन, दयालु और मिलनसार था। उसके दो पुत्र थे, एक घर में था, दूसरा बाहर नौकरी पर गया हुआ था। वह खुद घर में बैठा बैठा बढ़़ई का काम करता था।

बद्रीनाथ की यात्रा का संकल्प किए उन्हें बहुत दिन हो चुके थे। अर्जुन को छुट्टी ही नहीं मिलती थी। एक काम समाप्त होता था कि दूसरा आकर घेर लेता था। पहले पोते का व्याह करना था, फिर छोटे लड़के का गौना आ गया, इसके पीछे मकान बनना प्रारम्भ हो गया। एक दिन बाहर लकड़ी पर बैठकर दोनों में बातें होने लगी।

मोहन-क्यों भाई, अब यात्रा करने का विचार कब है?

अर्जुन-जरा ठहरो। अब की वर्ष अच्छा नहीं लगा। मैंने यह समझा था कि सौ रुपये में मकान तैयार हो जाएगा लेकिन तीन सौ रुपये लगा चुके हैं अभी भी दिल्ली दूर है। अगले वर्ष चलेंगे।

मोहन-शुभ कार्य में देरी करना अच्छा नहीं होता। मेरे विचार में तो तुरंत चल देना ही उचित है, दिन बहुत अच्छे हैं।

अर्जुन-दिन तो अच्छे हैं, पर मकान का क्या करुं! इसे किस पर छोडूं?

मोहन-क्या कोई संभालने वाला ही नहीं, बड़े लड़के को सौंप दो।

अर्जुन-उसका क्या भरोसा है।

मोहन-वाह वाह, भला बताओ तो कि मरने पर कौन संभालेगा? इससे तो यह अच्छा है कि जीतेजी संभाल लें। और तुम सुख से जीवन व्यतीत करो।

अर्जुन-यह सत्य है, पर किसी काम में हाथ लगाकर उसे पूरा करने की इच्छा सभी की होती है।

मोहन-तो काम कभी पूरा नहीं होता, कुछ न कुछ कसर रह ही जाती है। कल ही की बात है कि रामनवमी के लिए स्त्रियां कई दिनों से तैयारी कर रही थीं-कहीं लिपाई होती थी, कहीं आटा पीसा जाता था। इतने में रामनवमी आ पहुंची। बहू बोली, परमेश्वर की बड़ी कृपा है कि त्योहार बिना बुलाए ही आ जाते हैं, नहीं तो हम अपनी तैयारी ही करती रहें।

अर्जुन-एक बात और है, इस मकान पर मेरा बहुत रुपया खर्च हो गया है। इस समय रुपये का भी तोड़ा है। कमसे-कम सौ रुपये तो हों, नहीं तो यात्रा कैसे होगी।

मोहन-(हंसकर) अहा हा! जो जितना धनवान होता है, वह उतना ही कंगाल होता है तुम और रुपये की चिंता! जाने दो। मैं सच कहता हूं, इस समय मेरे पास एक सौ रुपये भी नहीं, परन्तु जब चलने का निश्चय हो जायेगा, तो रुपया भी कहीं न कहीं से अवश्य आ ही जाएगा। बस, यह बतलाओ कि चलना कब है?

अर्जुन-तुमने रुपये जोड़ रखे होंगे, नहीं तो कहां से आ जाएगा, बताओ तो सही।

मोहन-कुछ घर में से, कुछ माल बेचकर। पड़ोसी कुछ चौखट आदि मोल लेना चाहता है, उसे सस्ती दे दूंगा।

अर्जुन-सस्ती बेचने पर पछतावा होगा।

मोहन-मैं सिवाय पाप के और किसी बात पर नहीं पछताता। आत्मा से कौन चीज़ प्यारी है!

अर्जुन-यह सब ठीक है, परन्तु घर के कामकाज बिसराना भी उचित नहीं।

मोहन-और आत्मा को बिसराना तो और भी बुरा है। जब कोई बात मन में ठान ली तो उसे बिना पूरा किए न छोड़ना चाहिए।


2

अन्त में चलना निश्चय हो गया। चार दिन पीछे जब विदा होने का समय आया, तो अर्जुन अपने बड़े लड़के को समझाने लगा कि मकान पर छत इस प्रकार डालना, भूसी बखार में इस भांति जमा कर देना, मंडी में जाकर अनाज इस भाव से बेचना, रुपये संभालकर रखना, ऐसा न हो खो जावें, घर का प्रबन्ध ऐसा रखना कि किसी प्रकार की हानि न होने पावे। उसका समझाना समाप्त ही न होता था।

इसके प्रतिकूल मोहन ने अपनी स्त्री से केवल इतना ही कहा कि तुम चतुर हो, सावधानी से काम करती रहना।

मोहन तो घर से प्रसन्न मुख बाहर निकला और गांव छोड़ते ही घर के सारे बखेड़े भूल गया। साथी को प्रसन्न रखना, सुखपूर्वक यात्रा कर घर लौट आना उसका मन्तव्य था। राह चलता था तो ईश्वरसम्बन्धी कोई भजन गाता था या किसी महापुरुष की कथा कहता। सड़क पर अथवा सराय में जिस किसी से भेंट हो जाती, उससे बड़ी नरमता से बोलता।

अर्जुन भी चुपके -चुपके चल तो रहा था, परन्तु उसका चित्त व्याकुल था। सदैव घर की चिंता लगी रहती थी। लड़का अनजान है, कौन जाने क्या कर बैठे। अमुक बात कहना भूल आया। ओहो, देखू, मकान की छत पड़ती है या नहीं। यही विचार उसे हरदम घेरे रहते थे यहां तक कि कभी -कभी लौट जाने को तैयार हो जाता था।


3


चलते - चलते एक महीना पीछे वे पहाड़ पर पहुंच गए। पहाड़ी बड़े अतिथिसेवक होते हैं अब तक यह मोल का अन्न खाते रहे थे। अब उनकी खातिरदारी होने लगी।

 आगे चलकर वे ऐसे देश में पहुंचे, जहां दुर्घट अकाल पड़ा हुआ था। खेतियां सब सूख गई थीं, अनाज का एक दाना भी नहीं उगा था। धनवान कंगाल हो गए थे धनहीन देश को छोड़कर भीख मांगने बाहर भाग गए थे।

यहां उन्हें कुछ कष्ट हुआ, अन्न कम मिलता था और वह भी बड़ा महंगा। रात को उन्होंने एक जगह विश्राम किया। अगले दिन चलते - चलते उन्हें एक गांव मिला। गांव के बाहर एक झोंपड़ा था। मोहन थक गया था, बोला-मुझे प्यास लगी है। तुम चलो, मैं इस झोंपड़े से पानी पीकर अभी तुम्हें आ मिलता हूं। अजुर्न बोला-अच्छा, पी आओ। मैं धीरे - धीरे चलता हूं।

झोंपड़े के पास जाकर मोहन ने देखा कि उसके आगे धूप में एक मनुष्य पड़ा है। मोहन ने उससे पानी मांगा, उसने कोई उत्तर नहीं दिया। मोहन ने समझा कि कोई रोगी है।

समीप जाने पर झोंपड़े के भीतर एक बालक के रोने का शब्द सुनायी दिया। किवाड़ खुले हुए थे। वह भीतर चला गया।


4


उसने देखा कि नंगे सिर केवल एक चादर ओ़ेढ़े एक बुढ़िया धरती पर बैठी है, पास में भूख का मारा हुआ एक बालक बैठा रोटी- रोटी, पुकार रहा है। चूल्हे के पास एक स्त्री तड़प रही है, उसकी आंखें बन्द हैं और कंठ रुका हुआ है।

मोहन को देखकर बुढ़िया ने पूछा-तुम कौन हो? क्या मांगते हो? हमारे पास कुछ नहीं हैं।

मोहन-मुझे प्यास लगी है, पानी मांगता हूं।

बुढ़िया-यहां न बर्तन है, न कोई लाने वाला। यहां कुछ नहीं। जाओ, अपनी राह लो।

मोहन-क्या तुममें से कोई उस स्त्री की सेवा नहीं कर सकता?

बुढ़िया-कोई नहीं। बाहर मेरा लड़का भूख से मर रहा है, यहां हम भूख से मर रहे हैं।

यह बातें हो ही रही थीं कि बाहर से वह मनुष्य भी गिरता पड़ता भीतर आया और बोला-काल और रोग दोनों ने हमें मार डाला। यह बालक कई दिन से भूखा है क्या करुं-यह कहकर रोने लगा और उसकी हिचकी बंध गई।

मोहन ने तुरन्त अपने थैले में से रोटी निकालकर उनके आगे रख दी।

बुढ़िया बोली-इनके कंठ सूख गए हैं, बाहर से पानी ले आओ। मोहन बुढ़िया से कुएं का पता पूछकर बाहर गया और पानी ले आया। सबने रोटी खाकर पानी पिया, परन्तु चूल्हे के पास वाली स्त्री पड़ी तड़पती रही। मोहन गांव में जाकर कुछ दाल, चावल मोल ले आया और खिचड़ी पकाकर सबको खिलायी।


5


तब बुढ़िया बोली-भाई, क्या सुनाऊं, निर्धन तो हम पहले ही थे, उस पर पड़ा अकाल। हमारी और भी दुर्गति हो गई। पहले पहल तो पड़ोसी अन्न उधार देते रहे, परन्तु वे क्या करते। वे आप भूखों मरने लगे, हमें कहां से देते।

मनुष्य ने कहा-मैं मजूरी करने निकला, दो -तीन दिन तो कुछ काम मिला, फिर किसी ने नौकर न रखा बुढ़िया और लड़की भीख मांगने लगीं। अन्न का अकाल था, कोई भीख भी न देता था। बहुतेरे यत्न किए पर कुछ न बन सका। भूख के मारे घास खाने लगे, इसी कारण यह मेरी स्त्री चूल्हे के पास पड़ी तड़प रही है।

बुढ़िया-पहले कई दिनों तक तो मैं चल फिरकर कुछ धंधा करती रही, परन्तु कहां तक? भूख और रोग ने जान ले ली। जो हाल है, तुम अपने नेत्रों से देख रहे हो।

उनकी व्यथा सुनकर मोहन ने विचारा कि आज रात यहीं रहना उचित है साथी से कल मिल लेंगे।

प्रातःकाल उठकर वह गांव में गया और खानेपीने की चीजें ले आया। घर में कुछ न था। वह वहां ठहरकर इस तरह काम करने लगा कि मानो अपना ही घर है। दो -तीन दिन पीछे सब चलने फिरने लगे और वह स्त्री उठ बैठी।


6


चौथे दिन एकादशी थी। मोहन ने विचारा कि आज सन्ध्या को इन सबके साथ बैठकर फलाहार करके कल प्रातःकाल चल दूंगा।

वह गांव में जाकर दूध, फल सब सामग्री लाकर बुढ़िया को देकर, आप पूजापाठ करने मन्दिर में चला गया। इन लोगों ने अपनी जमीन एक जमींदार के यहां गिरवी रखकर अकाल के समय अपना निर्वाह किया था। मोहन जब मन्दिर गया, तब किसान युवक जमींदार के पास पहुंचा और विनयपूर्वक बोला-चौधरी जी, इस समय रुपये देकर खेत छुड़ाना मेरे काबू के बाहर है। यदि आप इस चौमासे में मुझे खेत बोने की आज्ञा दे दें, तो मेहनत मजदूरी करके आपका ऋण चुका सकता हूं।

परन्तु चौधरी कब मानता था? वह बोला-बिना रुपये दिए खेत नहीं बो सकते जाओ, अपना काम करो। वह निराश होकर घर लौट आया। इतने में मोहन भी पहुंच गया। जमींदार की बात सुनकर वह मन में विचार करने लगा कि जब यह जमींदार खेत नहीं बोने देता, तो इन किसानों की प्राण रक्षा क्या करेगा! यदि मैं इन्हें इसी दशा में छोड़कर चल दिया, तो यह सब काल के कौर बन जायेंगे कल नहीं परसों जाऊंगा।

मोहन अब बड़ी दुविधा में पड़ा था। न रहते ही बनता था, न जाते ही बनता था। रात को पड़ा -पड़ा सोचने लगा, यह तो अच्छा बखेड़ा फैला। पहले अन्न पानी, अब खेत छुड़ाना, फिर गाय और बैलों की जोड़ी मोल लेना। मोहन तुम किस जंजाल में फंस गए?

जी चाहता था कि वह उन्हें ऐसे ही छोड़कर चल दे, परन्तु दया जाने न देती थी। सोचते सोचते आंख लग गई। स्वप्न में देखता क्या है कि वह जाना चाहता है और किसी ने उसे पकड़ लिया है। लौटकर देखा तो बालक रोटी मांग रहा है। वह तुरन्त उठ बैठा और मन में कहने लगा-नहीं, अब मैं नहीं जाता। यह स्वप्न शिक्षा देता है कि मुझे इनका खेत छुड़ाना, गाय बैल मोल लेना और सारा प्रबन्ध करके जाना उचित है।

प्रातःकाल उठकर जमींदार के पास गया और रुपया देकर उनका खेत छुड़ा दिया। जब एक किसान से एक गाय और दो बैल मोल लेकर लौट रहा था कि राह में स्त्रियों को बातें करते सुना।

’बहन, पहले तो हम उसे साधारण मनुष्य जानते थे। वह केवल पानी पीने आया था, पर अब सुना है कि खेत छुड़ाने और गाय बैल मोल लेने गया है। ऐसे महात्मा के दर्शन करने चाहिए।’ मोहन अपनी स्तुति सुनकर वहां से टल गया। गाय बैल लेकर जब झोंपड़े पर पहुंचा तो किसान ने पूछा- यह कहां से लाये?

मोहन-अमुक किसान से यह बड़े सस्ते मिल गए हैं। जाओ, पशुशाला में बांधकर इनके आगे कुछ भूसा डाल दो।

उसी रात जब सब सो गए, तो मोहन चुपके से उठकर घर से बाहर निकलकर बद्रीनाथ की राह ली।


7


तीन मील चलकर मोहन एक वृक्ष के नीचे बैठकर बटुआ निकालकर, रुपये गिनने लगा तो थोड़े ही रुपये बाकी थे। उसने सोचा-इतने रुपयों में बद्रीनारायण पहुंचना असम्भव है, भीख मांगना पाप है। अर्जुन वहां अवश्य पहुंचेगा और आशा है कि मेरे नाम पर कुछ च़ाढ़ावा भी च़ाढ़ा ही देगा। मैं तो अब इस जीवन में यह यात्रा करने का संकल्प पूरा नहीं कर सकता। अच्छा, परमात्मा की इच्छा, वह बड़ा दयालु है। मुझ जैसे पापियों को निःस्संदेह क्षमा कर देगा।

यह विचार करके वह गांव का चक्कर काटकर कि कोई देख न ले, वह घर की ओर लौट पड़ा।  

गांव में पहुंच जाने पर घर वाले उसे देखकर अति प्रसन्न हुए और पूछने लगे कि लौट क्यों आये? मोहन ने यही उत्तर दिया कि अर्जुन से साथ छूट गया और रुपये चोरी हो गए, इस कारण लौट आना पड़ा। घर में सब कुशलक्षेम था। कोई कष्ट न था।

मोहन का आना सुनकर अर्जुन के घर वाले उससे पूछने लगे कि अर्जुन को कहां छोड़ा उनसे भी उसने यही कहा कि बद्रीनाथ पहुंचने से तीन दिन पहले मैं अर्जुन से पिछड़ गया, रुपया किसी ने चुरा लिया, बद्रीनाथ जाना असम्भव था, इसलिए मुझे लौटना ही पड़ा।

सब लोग मोहन की बुद्धि पर हंसने लगे कि बद्रीनाथ पहुंचा ही नहीं, रास्ते में रुपये खो दिए। मोहन घर के धंधे में लग गया, बात बीत गई।


8


अब उधर का हाल सुनिए-

मोहन जब पानी पीने चला गया तब थोड़ी दूर जाकर अर्जुन बैठ गया और साथी की बाट देखने लगा। सन्ध्या हो गई, पर मोहन न आया।

अर्जुन सोचने लगा-क्या हुआ, साथी क्यों नहीं आया? मेरी आंखें लग गई थीं। कहीं आगे न निकल गया हो। पर यहां से जाता तो क्या दिखायी नहीं देता? पीछे लौटकर देखूं, कहीं आगे न चला गया हो, फिर तो मिलना ही असम्भव है। आगे ही चलो, रात को चट्टी पर अवश्य भेंट हो जाएगी।

रास्ते में अजुर्न ने कई मनुष्यों से पूछा कि तुमने कोई नाटा, सांवले रंग का आदमी देखा है? परन्तु कुछ पता न चला। रात चट्टी पर भी मोहन से भेंट न हुई। अगले दिन यह विचार कर कि वह देवप्रयाग पर अवश्य मिल जाएगा, वह आगे चल दिया।

रास्ते में अजुर्न को एक साधु मिल गया। वह जगन्नाथ की यात्रा करके आया था। अब दूसरी बार बद्रीनारायण के दर्शन को जा रहा था। रात को चट्टी में वे दोनों इकट्ठे ही रहे और फिर एक साथ यात्रा करने लगे।

देवप्रयाग में पहुंचकर अर्जुन ने मोहन के विषय में पंडे से बहुत पूछताछ की, पर कुछ पता न चला। यहां सब यात्री एकत्र हो गए। देवप्रयाग से आगे चलकर सब लोग रात को एक चट्टी में ठहरे। वहां मूसलाधार मेंह बरसने लगा। बिजली की कड़क, बादल की गरज से सब कांप गए। सारी रात जागते कटी। त्राहित्राहि करते दिन निकला।

अन्त को दोपहर के समय सब लोग बद्रीनाथ पहुंच गए। पंडे देवप्रयाग से ही साथ हो लिये थे। बद्रीनाथ में यही रीति है कि पहले दिन यात्रियों को मन्दिर की ओर से भोजन कराया जाता है और उसी दिन यात्रियों को अटका अथवा च़ढ़ावा बतला देना पड़ता है कि कौन कितना च़ढ़ाएगा, कम से कम सवा रुपया नियत है। उस समय तो सबने पंडों के घरों में जाकर विश्राम किया। दूसरे दिन प्रातःकाल उठकर दर्शन में लग गए। अर्जुन और साधु एक ही स्थान में टिके थे। सांझ की आरती के दर्शन करके लौटकर जब घर आये, तब साधु बोला कि मेरा तो किसी ने रुपये का बटुआ निकाल लिया।


9


अजुर्न के मन में यह पाप उत्पन्न हुआ कि यह साधु झूठा है। किसी ने इसका रुपया नहीं चुराया। इसके पास रुपया था ही नहीं।

लेकिन तुरन्त ही उसको पश्चाताप हुआ कि किसी पुरुष के विषय में ऐसी कल्पना करना महापाप है। उसने मन को बहुतेरा समझाया, परंतु उसका ध्यान साधु में ही लगा रहा। पवित्र स्थान में रहने पर भी चित्त की मलिनता दूर नहीं हुई। इतने में शयन की आरती का घंटा बजा। दोनों दर्शनार्थ मन्दिर में चले गए। 

भीड़ बहुत थी, अजुर्न नेत्र मूंदकर भगवान की स्तुति करने लगा, परंतु हाथ बटुए पर था, क्योंकि साधु के रुपये खो जाने से संस्कार चित्त में पड़े हुए थे। अन्तःकरण का शुद्ध हो जाना क्या कोई सहज बात है!


10


स्तुति समाप्त करके नेत्र खोलकर अर्जुन जब भगवान के दर्शन करने लगा, तब देखता क्या है कि मूर्ति के अति समीप मोहन खड़ा है। ऐ-मोहन! नहीं नहीं, मोहन यहां कैसे पहुंच सकता है? सारे रास्ते तो ढूँढता आया हूं।

मोहन को साष्टांग दण्डवत करते देखकर अर्जुन को निश्चय हो गया कि यह मोहन ही है। शायद किसी दूसरी राह से यहां आ पहुंचा है। चलो, अच्छा हुआ, साथी तो मिल गया।

आरती हो गई। यात्री बाहर निकलने लगे। अर्जुन का हाथ बटुए पर था कि कोई रुपये न चुरा ले। वह मोहन को खोजने लगा, पर उसका कहीं पता नहीं चला।

दूसरे दिन प्रातःकाल मन्दिर में जाने पर अर्जुन ने फिर देखा कि मोहन हाथ जोड़े भगवान के सम्मुख खड़ा है। वह चाहता था कि आगे ब़ढ़कर मोहन को पकड़ ले, परन्तु ज्योंही वह आगे ब़ाढ़ा, मोहन लोप हो गया।

तीसरे दिन भी अर्जुन को वही दृश्य दिखाई दिया। उसने विचारा कि चलकर द्वार पर खड़े हो जाऐं। सब यात्री वहीं से निकलेंगे, वहीं मोहन को पकड़ लूंगा। अतएव उसने ऐसा ही किया, लेकिन सब यात्री निकल गए, मोहन का कहीं पता ही नहीं।

एक सप्ताह बद्रीनाथ में निवास करके अर्जुन घर लौट पड़ा।


11


राह चलते अर्जुन के चित्त में वही पुराने घर के झमेले बार -बार आने लगे। साल भर बहुत होता है। इतने दिनों में घर की दशा न जाने क्या हुई हो। कहावत है-छाते लगे छः मास और छिन में होय उजाड़। कौन जाने लड़के ने क्या कर छोड़ा हो? फसल कैसी हो? पशुओं का पालनपोषण हुआ है कि नहीं?

चलते-चलते अजुर्न जब उस झोपड़े के पास पहुंचा, जहां मोहन पानी पीने गया था, तो भीतर से एक लड़की ने आकर उसका कुर्ता पकड़ लिया और बोली-बाबा, बाबा भीतर चलो।

अर्जुन कुर्ता छुड़ाकर जाना चाहता था कि भीतर से एक स्त्री बोली-महाशय! भोजन करके रात्रि को यहीं विश्राम कीजिए। कल चले जाना। वह अंदर चला गया और सोचने लगा कि मोहन यहीं पानी पीने आया था। शायद इन लोगों से उसका कुछ पता चल जाए।

स्त्री ने अर्जुन के हाथ पैर धुलाकर भोजन परस दिया। अर्जुन उसको आशीष देने लगा।

स्त्री बोली-दादा, हम अतिथिसेवा करना क्या जानें? यह सब कुछ हमें एक यात्री ने सिखाया है। हम परमात्मा को भूल गए थे। हमारी यह दशा हो गई थी कि यदि वह यात्री न आता तो हम सबके-सब मर जाते। वह यहां पानी पीने आया था। हमारी दुर्दशा देखकर यहीं ठहर गया। हमारा खेत रेहन पड़ा था, वह छुड़ा दिया। गाय बैल मोल लेकर दे दिए और सब सामग्री जुटाकर एक दिन न जाने कहां चला गया।

इतने में एक बुढ़िया आ गई और यह बात सुनकर बोल उठी-वह मनुष्य नहीं था, साक्षात देवता था। उसने हमारे ऊपर दया की, हमारा उद्धार कर दिया, नहीं तो हम मर गए होते । वह पानी मांगने आया। मैंने कहा, जाओ, यहां पानी नहीं। जब मैं वह बात स्मरण करती हूं, तो मेरा शरीर कांप उठता है।

छोटी लड़की बोल उठी-उसने अपनी कांवर खोली और उसमें से लोटा निकालकर कुएं की ओर चला।

इस तरह सबके-सब मोहन की चर्चा करने लगे। रात को किसान भी आ पहुंचा और वही चर्चा करने लगा-निस्संदेह उस यात्री ने हमें जीवनदान दिया। हम जान गए कि परमेश्वर क्या है और परोपकार क्या। वह हमें पशुओं से मनुष्य बना गया।

अर्जुन ने अब समझा कि बद्रीनाथ के मंदिर में मोहन के दिखायी देने का कारण क्या था। उसे निश्चय हो गया कि मोहन की यात्रा सफल हुई।

कुछ दिनों पीछे अजुर्न घर पहुंच गया। लड़का शराब पीकर मस्त पड़ा था। घर का हाल सब गड़बड़ था। अर्जुन लड़के को डांटने लगा। लड़के ने कहा-तो यात्रा पर जाने को किसने कहा था? न जाते। इस पर अर्जुन ने उसके मुंह पर तमाचा मारा।

दूसरे दिन अर्जुन जब चौधरी से मिलने जा रहा था, तो राह में मोहन की स्त्री मिल गई।

स्त्री-भाई जी, कुशल से तो हो? बद्रीनाथ हो आये?

अर्जुन-हां, हो आया। मोहन मुझसे रास्ते में बिछुड़ गए थे। कहो, वह कुशल से घर तो पहुंच गए?

स्त्री-उन्हें आये तो कई महीने हो गए। उनके बिना हम सब उदास रहा करते थे। लड़के को तो घर काटे खाता था। स्वामी बिना घर सूना होता है।

अर्जुन-घर में हैं कि कहीं बाहर गये हैं?

स्त्री-नहीं, घर में हैं।

अर्जुन भीतर चला गया और मोहन से बोला-राम-राम, भैया मोहन, राम-राम!

मोहन-राम-राम! आओ भाई! कहो, दर्शन कर आये!

अर्जुन-हां, कर तो आया, पर मैं यह नहीं कह सकता कि यात्रा सफल हुई अथवा नहीं। लौटते समय मैं उस झोंपड़े में ठहरा था, जहां तुम पानी पीने गये थे।

मोहन ने बात टाल दी और अर्जुन भी चुप हो गया, परंतु उसे विश्वास हो गया कि उत्तम तीर्थयात्रा यही है कि पुरुष जीवन पर्यन्त प्रत्येक प्राणी के साथ प्रेमभाव रखकर सदैव उपकार में तत्पर रहे।


Charles Perrault

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